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ChiliFarming – दरभंगा की महिला किसान की मेहनत से बढ़ी आमदनी

ChiliFarming – दरभंगा जिले के एयरपोर्ट से सटे कषनारायणी गांव में एक महिला किसान अपनी मेहनत से नई मिसाल कायम कर रही हैं। सुनील देवी ने महज पांच कट्ठा जमीन पर मिर्च की खेती शुरू की और आज उसी से उनके परिवार की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो रही है। गांव में ‘बुलेट’ किस्म की मिर्च बड़े पैमाने पर उगाई जाती है, और सुनील देवी भी इसी किस्म को प्राथमिकता देती हैं। वह बताती हैं कि रोपाई के करीब तीन से चार महीने बाद ही पौधों में फल लगने शुरू हो जाते हैं। सही देखभाल के साथ एक पौधे से दो से तीन किलो तक मिर्च मिल जाती है, जिससे अच्छी आमदनी संभव हो पाती है।

Darbhanga woman chili farmer income

खेती की तैयारी और उत्पादन का तरीका

सुनील देवी के अनुसार मिर्च की खेती में शुरुआती तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। सबसे पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है। इसके बाद गोबर खाद और अन्य पोषक तत्व डालकर जमीन को तैयार किया जाता है। पौध रोपने के बाद उसके चारों ओर मिट्टी चढ़ाई जाती है ताकि जड़ें मजबूत रहें और पौधा सीधा बढ़े।

खाद के रूप में वह डीएपी, एल्यूमिनियम सल्फेट और यूरिया का संतुलित इस्तेमाल करती हैं। उनका कहना है कि यदि खाद और सिंचाई का ध्यान रखा जाए तो फसल बेहतर होती है और उत्पादन भी उम्मीद से ज्यादा मिलता है। समय पर निराई-गुड़ाई और कीट नियंत्रण भी जरूरी है, जिससे पौधों को किसी तरह का नुकसान न हो। यही कारण है कि सीमित जमीन होने के बावजूद उन्हें संतोषजनक उपज मिल रही है।

सरकारी सहयोग की कमी का मुद्दा

हालांकि मेहनत रंग ला रही है, लेकिन सुनील देवी का कहना है कि उन्हें सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। उनका दावा है कि न तो मुफ्त बीज वितरण की सुविधा मिली और न ही किसी विशेष योजना के तहत आर्थिक सहायता। वे अपनी उपज स्थानीय बाजार में बेचती हैं, जहां दाम मौसम के अनुसार बदलते रहते हैं।

उनका मानना है कि यदि प्रखंड या कृषि विभाग की ओर से मार्गदर्शन और सहायता मिले तो उत्पादन और बढ़ाया जा सकता है। छोटे किसानों के लिए शुरुआती लागत और बाजार तक पहुंच बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में सरकारी समर्थन से ग्रामीण महिलाओं को और मजबूती मिल सकती है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मिर्च की खेती की भूमिका

गांवों में मिर्च की खेती रोजगार का एक स्थायी जरिया बन रही है। कम जमीन में भी इसकी खेती संभव है और यदि बाजार उपलब्ध हो तो मुनाफा भी बेहतर मिलता है। एक पौधे से दो से तीन किलो उत्पादन छोटे किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सब्जी फसलों की मांग पूरे वर्ष बनी रहती है, जिससे किसानों को नकद आय मिलती है। यही वजह है कि कई किसान पारंपरिक धान या गेहूं के साथ-साथ सब्जी खेती को भी अपना रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और आत्मनिर्भरता भी बढ़ती है।

मांग और संभावनाएं

सुनील देवी चाहती हैं कि मिर्च की खेती के लिए विशेष योजना बनाई जाए, ताकि छोटे और सीमांत किसानों को सीधा लाभ मिल सके। उनका सुझाव है कि मुफ्त बीज, तकनीकी प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे उत्पादन लागत घटेगी और आय में स्थिरता आएगी।

दरभंगा के इस गांव में मिर्च की खेती ने यह दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि सही तरीके अपनाए जाएं तो बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। सुनील देवी की पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है और यह संकेत भी दे रही है कि सब्जी खेती भविष्य में आय का मजबूत माध्यम बन सकती है।

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