Success Story – पढ़ाई के साथ छात्रा ने शुरू की जैविक मक्के की खेती, और कर दिखाया कमाल…
Success Story – उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले की एक छात्रा इन दिनों अपनी पढ़ाई के साथ खेती में किए जा रहे प्रयासों को लेकर चर्चा में है। रूपईडीह विकासखंड के मधवा नगर गांव की रहने वाली पूर्णिमा चतुर्वेदी जैविक तरीके से मक्के की खेती कर रही हैं और आसपास के किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनकी पहल को गांव के लोग नई सोच और आत्मनिर्भरता की मिसाल के रूप में देख रहे हैं।

पढ़ाई के साथ खेती को बनाया नई पहचान
पूर्णिमा वर्तमान में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं। इसके साथ ही वह खेती-किसानी के काम में भी सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। उनका कहना है कि खेती केवल पारंपरिक पेशा नहीं बल्कि बेहतर भविष्य और सम्मानजनक आय का मजबूत माध्यम भी बन सकती है। इसी सोच के साथ उन्होंने जैविक खेती की दिशा में कदम बढ़ाया।
उन्होंने अपने खेत में मक्के की फसल को बिना रासायनिक खाद और हानिकारक कीटनाशकों के तैयार करना शुरू किया। खेती में गोबर की खाद, जीवामृत और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल रही है और फसल उत्पादन भी संतुलित तरीके से हो रहा है।
किसानों को जागरूक करने से मिला खेती का विचार
पूर्णिमा ने बताया कि उन्हें जैविक खेती की प्रेरणा पानी संस्थान में काम करते हुए मिली। वह वहां सीआरपी के रूप में कार्यरत हैं, जहां किसानों को खेती से जुड़ी नई जानकारी और तकनीकों के बारे में जागरूक किया जाता है। किसानों से लगातार संवाद के दौरान उनके मन में यह विचार आया कि अगर वह खुद खेती करके उदाहरण पेश करेंगी तो लोग अधिक प्रभावित होंगे।
इसी सोच के साथ उन्होंने करीब एक से डेढ़ बीघा जमीन में मक्के की खेती शुरू की। उनका मानना है कि जब किसान किसी को खुद खेती करते हुए देखते हैं, तो नई तकनीकों को अपनाने में अधिक भरोसा महसूस करते हैं।
कम लागत में बेहतर आय की उम्मीद
पूर्णिमा के अनुसार, एक से डेढ़ बीघा खेत में जैविक मक्के की खेती करने में लगभग एक से दो हजार रुपये तक की शुरुआती लागत आई है। उनका कहना है कि यदि मौसम और फसल की स्थिति अनुकूल रही, तो इस खेती से अच्छी आय प्राप्त हो सकती है।
खेती में लागत कम रखने के लिए स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया गया है। इससे न केवल खर्च घटा है, बल्कि खेती अधिक टिकाऊ भी बनी है। ग्रामीण क्षेत्रों में जैविक खेती की बढ़ती मांग को देखते हुए किसान अब पारंपरिक तरीकों के विकल्प तलाश रहे हैं।
युवाओं के लिए खेती को बताया अवसर
पूर्णिमा का मानना है कि यदि युवा आधुनिक सोच और नई तकनीकों के साथ खेती करें, तो यह रोजगार का मजबूत जरिया बन सकती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में खेती को केवल मेहनत वाला काम समझने की सोच बदलने की जरूरत है। सही योजना और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर किसान बेहतर कमाई कर सकते हैं।
उनकी इस पहल का असर आसपास के गांवों में भी दिखाई देने लगा है। कई किसान अब प्राकृतिक खेती और कम लागत वाली कृषि पद्धतियों के बारे में जानकारी लेने पहुंच रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग इसे युवाओं के लिए प्रेरणादायक कदम मान रहे हैं।
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहा रुझान
विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक और प्राकृतिक खेती मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के साथ लंबे समय में किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होने से खेती की लागत घटती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।
पूर्णिमा चतुर्वेदी की कोशिश यह दिखाती है कि शिक्षा और खेती एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। उनकी कहानी ग्रामीण युवाओं के बीच खेती को लेकर नई सोच विकसित करने में मदद कर रही है।