Farming Success story – एलएलबी के बाद खेती अपनाकर युवक ने बदली बंजर जमीन की तस्वीर
Farming Success story – कई युवा आज पारंपरिक नौकरी की बजाय खेती और ग्रामीण उद्यम की ओर रुख कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के सीधी जिले के रहने वाले परीक्षित सिंह भी उन्हीं युवाओं में शामिल हैं, जिन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद अलग राह चुनी। आर्ट विषय से ग्रेजुएशन और फिर एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके पास नौकरी करने के कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने गांव लौटकर खेती को अपना पेशा बनाया। उनका मानना था कि नौकरी केवल एक व्यक्ति तक सीमित रहती है, जबकि खेती के जरिए कई लोगों को रोजगार दिया जा सकता है।

बंजर जमीन को मेहनत से बनाया उपजाऊ
परीक्षित सिंह ने वर्ष 2022 में खेती की शुरुआत की। शुरुआत आसान नहीं थी, क्योंकि पैतृक जमीन लंबे समय से अनुपयोगी पड़ी थी। खेतों की मिट्टी कमजोर हो चुकी थी और सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था भी नहीं थी। आसपास के कई लोगों का मानना था कि उस जमीन पर अच्छी खेती संभव नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार खेत की गुणवत्ता सुधारने पर काम किया।
उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र की मदद से मिट्टी परीक्षण कराया और प्राकृतिक तरीकों से जमीन को उपजाऊ बनाने की प्रक्रिया शुरू की। खेतों में देसी गोबर खाद, वर्मीकम्पोस्ट और जीवामृत का उपयोग किया गया। धीरे-धीरे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी और कुछ समय बाद वही खेत हरी फसलों से भरने लगे।
प्राकृतिक खेती से बढ़ी आमदनी
वर्तमान में परीक्षित सिंह करीब 15 एकड़ क्षेत्र में मूंग की खेती कर रहे हैं। गेहूं की कटाई के बाद मार्च में मूंग बोई गई थी और अब अगली फसल के रूप में धान की तैयारी चल रही है। इसके साथ ही गर्मियों के मौसम में 10 एकड़ से अधिक जमीन पर विभिन्न सब्जियों की खेती भी की जा रही है।
उनकी उपज स्थानीय बाजारों के अलावा आसपास के क्षेत्रों में भी पहुंच रही है। प्राकृतिक तरीके से उगाई गई सब्जियों और अनाज की मांग लगातार बढ़ रही है। परीक्षित सिंह का कहना है कि यदि खेती को योजना और वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो इससे अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। सभी खर्च निकालने के बाद उन्हें हर साल लगभग 15 से 16 लाख रुपये तक की आय हो रही है।
रासायनिक खाद से दूरी बना रहे किसान
परीक्षित सिंह पूरी तरह प्राकृतिक खेती पर जोर दे रहे हैं। खेतों में रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद और प्राकृतिक घोलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका कहना है कि इससे खेती की लागत कम होती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्राकृतिक खेती अपनाने से फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है और बाजार में उत्पादों को अच्छी कीमत मिलती है। यही वजह है कि उनकी सब्जियां और अनाज स्थानीय ग्राहकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
गांव में रोजगार के नए अवसर बने
खेती के माध्यम से परीक्षित सिंह ने सिर्फ अपनी आय नहीं बढ़ाई, बल्कि गांव के अन्य लोगों को भी काम उपलब्ध कराया है। वर्तमान में उनके खेतों में करीब 15 से 20 लोग नियमित रूप से काम कर रहे हैं। इससे गांव के युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने लगा है और बाहर पलायन की स्थिति भी कम हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की पहल को कृषि विशेषज्ञ भी सकारात्मक बदलाव मान रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र सीधी के वैज्ञानिक प्रमुख डॉ. शैलेंद्र गौतम ने बताया कि परीक्षित सिंह को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाले किसानों में शामिल किया गया है। उनके खेतों में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित उन्नत गेहूं किस्म HD-3410 की खेती भी कराई गई थी, ताकि क्षेत्र के अन्य किसानों को बेहतर बीज और नई तकनीकों की जानकारी मिल सके।
युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही खेती
आज के समय में जहां बड़ी संख्या में युवा शहरों की ओर रोजगार के लिए जा रहे हैं, वहीं परीक्षित सिंह जैसे किसान गांव में रहकर आधुनिक और प्राकृतिक खेती का मॉडल तैयार कर रहे हैं। उनकी सफलता यह दिखाती है कि सही योजना, तकनीकी जानकारी और मेहनत के दम पर खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाया जा सकता है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों का संयोजन आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ऐसे उदाहरण युवा पीढ़ी को खेती की ओर आकर्षित करने में भी मदद कर रहे हैं।