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Agriculture success story – पढ़ाई के साथ मक्के की खेती से युवा किसान ने बदली कमाई की तस्वीर

Agriculture success story – उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक युवा किसान ने खेती को आधुनिक तरीके से अपनाकर यह दिखाया है कि नई सोच और मेहनत के दम पर खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है। खास बात यह है कि यह युवा अपनी उच्च शिक्षा जारी रखते हुए खेती भी संभाल रहा है और मक्के की फसल से अच्छी आय अर्जित कर रहा है। इलाके में उसकी खेती की चर्चा अब दूसरे किसानों के बीच भी होने लगी है।

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पारंपरिक खेती छोड़ अपनाया नया तरीका

गोंडा के रहने वाले शिवांश मिश्रा फिलहाल ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने खेती को भी गंभीरता से अपनाया है। शिवांश बताते हैं कि पहले उनके परिवार में धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं, लेकिन इन फसलों में लागत के मुकाबले अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा था। इसी दौरान उन्होंने दूसरी फसलों के विकल्प तलाशने शुरू किए।

उनके अनुसार, एक बार वह अपने मित्र के खेत पर गए, जहां उन्होंने मक्के की बेहतर फसल देखी। वहीं से उनके मन में मक्के की खेती को लेकर रुचि पैदा हुई। इसके बाद उन्होंने खेती से जुड़ी नई तकनीकों और उन्नत बीजों के बारे में जानकारी जुटाई और छोटे स्तर पर इसकी शुरुआत की।

वैज्ञानिक पद्धति से बढ़ा उत्पादन

शिवांश ने शुरुआत में सीमित जमीन पर मक्के की खेती शुरू की थी, लेकिन अच्छे परिणाम मिलने के बाद अब वह लगभग एक से डेढ़ बीघा क्षेत्र में इसकी खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि फसल की सफलता के पीछे वैज्ञानिक तरीके से खेती करना सबसे बड़ा कारण रहा।

उन्होंने समय पर बुवाई, संतुलित सिंचाई और उचित पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया। साथ ही फसल को कीटों से बचाने के लिए भी सावधानी बरती गई। इन प्रयासों का असर उत्पादन पर साफ दिखाई दिया और बाजार में उनकी उपज को बेहतर कीमत मिलने लगी।

जैविक खाद से बढ़ी बाजार में मांग

शिवांश मिश्रा का कहना है कि वह रासायनिक खाद का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं। खेत में मुख्य रूप से गोबर की खाद और वर्मीकंपोस्ट जैसी जैविक खादों का उपयोग किया जाता है। उनका मानना है कि जैविक तरीके से उगाई गई फसल की गुणवत्ता बेहतर रहती है, जिससे ग्राहकों का भरोसा भी बढ़ता है।

उन्होंने बताया कि स्थानीय बाजार में उनके मक्के की मांग अच्छी रहती है और कई लोग सीधे खेत से ही खरीदारी करने पहुंच जाते हैं। जैविक खेती के कारण उपज की गुणवत्ता बेहतर होने से उन्हें सामान्य बाजार दर से अधिक कीमत मिलने की संभावना रहती है।

लाइन पद्धति से खेती का मिला फायदा

मक्के की खेती में शिवांश लाइन टू लाइन पद्धति का उपयोग कर रहे हैं। इस तरीके से पौधों के बीच पर्याप्त दूरी बनी रहती है और फसल को हवा से गिरने का खतरा कम होता है। साथ ही खेत में देखभाल और सिंचाई का काम भी आसान हो जाता है।

उन्होंने बताया कि एक से डेढ़ बीघा मक्के की खेती में लगभग पांच से छह हजार रुपये तक की लागत आई है। इस बार फसल की स्थिति अच्छी है और यदि बाजार में दाम अनुकूल रहे, तो बेहतर मुनाफा मिलने की उम्मीद है।

पढ़ाई और खेती दोनों को दे रहे समय

शिवांश का कहना है कि सही समय प्रबंधन के जरिए पढ़ाई और खेती दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है। वह सुबह और शाम खेत में काम करते हैं, जबकि दिन का बाकी समय अपनी पढ़ाई को देते हैं। उनका मानना है कि युवा अगर आधुनिक तकनीक के साथ खेती करें, तो कृषि क्षेत्र में भी बेहतर भविष्य बनाया जा सकता है।

कृषि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि नई पीढ़ी का खेती की ओर बढ़ता रुझान ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। आधुनिक तकनीक, जैविक खेती और बेहतर प्रबंधन के जरिए कम जमीन में भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है।

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