OkraFarming – नौकरी की तलाश छोड़ युवा ने खेती में बनाया नया रास्ता
OkraFarming – आज के समय में जहां बड़ी संख्या में युवा नौकरी की तलाश में शहरों का रुख कर रहे हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो विपरीत परिस्थितियों में अपने लिए नया रास्ता तैयार कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रहने वाले दीप नारायण मौर्य ने भी इसी सोच के साथ खेती को अपनाकर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की है। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने लंबे समय तक सरकारी नौकरी की तैयारी की, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। ऐसे में उन्होंने परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए खेती को ही अपने भविष्य का आधार बनाने का निर्णय लिया।

पढ़ाई के बाद संघर्ष और गांव वापसी
दीप नारायण बताते हैं कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, लेकिन उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिला। कुछ समय के लिए वह गांव से बाहर भी काम करने गए, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें वापस लौटना पड़ा। गांव लौटने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी समस्या रोजगार की थी। सीमित संसाधन और खेती का कम अनुभव होने के कारण शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय नए विकल्प तलाशने शुरू किए।
पारंपरिक खेती से नहीं मिला संतोष
शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक खेती का सहारा लिया, लेकिन इसमें लागत ज्यादा और मुनाफा अपेक्षाकृत कम था। इससे उन्हें यह महसूस हुआ कि अगर खेती में टिके रहना है, तो कुछ नया करना जरूरी है। इसी दौरान उन्हें एक कृषि संस्थान के माध्यम से सब्जी की खेती के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से भिंडी की खेती शुरू करने का फैसला लिया।
बेहतर किस्मों का चयन बना अहम कदम
दीप नारायण ने अपनी खेती के लिए ऐसी किस्मों का चयन किया, जो स्थानीय जलवायु में बेहतर उत्पादन दे सकें। वर्तमान में वे वीएनआर वीबीएच 11 और राधिका किस्म की भिंडी उगा रहे हैं। उनका कहना है कि इन किस्मों की खासियत यह है कि इनसे उत्पादन अच्छा मिलता है और फसल की गुणवत्ता भी बाजार की मांग के अनुरूप होती है। सही किस्मों का चयन उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
कम समय में मिलने लगा उत्पादन
भिंडी की खेती का एक बड़ा लाभ यह है कि यह कम समय में तैयार हो जाती है। दीप नारायण के अनुसार, बुवाई के लगभग 60 से 65 दिनों के भीतर पौधे फल देने लगते हैं और करीब 70 दिन के बाद कटाई शुरू हो जाती है। इससे किसानों को जल्दी आय मिलने लगती है, जो आर्थिक रूप से काफी सहायक साबित होती है। यही वजह है कि अब वे इस खेती को एक स्थायी विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
बेड विधि से लागत और मेहनत में कमी
दीप नारायण बेड विधि से खेती कर रहे हैं, जिसे उन्होंने काफी प्रभावी पाया है। इस पद्धति में पानी की खपत कम होती है और खेत में खरपतवार भी कम उगते हैं। उन्होंने बताया कि बेड के बीच लगभग दो फीट की दूरी रखी जाती है, जबकि पौधों के बीच 8 से 10 इंच का अंतर रखा जाता है। इससे पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है और उनकी वृद्धि बेहतर होती है। साथ ही, इस विधि से खेत की देखभाल भी आसान हो जाती है।
बेहतर बाजार भाव से बढ़ी उम्मीद
इस बार दीप नारायण की फसल अच्छी स्थिति में है और उन्हें उम्मीद है कि बाजार में उचित कीमत मिलने पर उन्हें अच्छा मुनाफा होगा। उनकी यह पहल न केवल उनके लिए नई शुरुआत साबित हो रही है, बल्कि आसपास के युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है। वे मानते हैं कि अगर सही जानकारी और मेहनत के साथ खेती की जाए, तो यह रोजगार का मजबूत विकल्प बन सकती है।

