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Success story: सहारनपुर के किसान ने जापानी औषधीय मशरूम से बदली खेती की दिशा

Success story: सहारनपुर जनपद धीरे-धीरे मशरूम उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है और आज इसे प्रदेश के अग्रणी उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाने लगा है। परंपरागत खेती पर निर्भर रहने वाले किसानों का रुझान अब धीरे-धीरे वैज्ञानिक और बाजारोन्मुख कृषि पद्धतियों की ओर बढ़ रहा है। इसी बदलाव की एक सशक्त मिसाल बेहट विधानसभा क्षेत्र के मुर्तजापुर गांव के युवा किसान हिमांशु सैनी हैं, जिन्होंने सीमित भूमि होने के बावजूद नवाचार के दम पर अपनी खेती का स्वरूप बदल दिया है। उन्होंने खुले खेतों के बजाय अपने घर में टीन शेड का छोटा-सा नियंत्रित वातावरण तैयार कर मशरूम उत्पादन शुरू किया और स्थानीय स्तर पर नई संभावनाओं की नींव रखी।

Saharanpur farmer success with shiitake

पारंपरिक खेती से हटकर नया रास्ता

हिमांशु सैनी का कृषि सफर आम किसानों से अलग रहा है। शुरूआत में उन्होंने बटन मशरूम, मिल्की मशरूम और किंग ऑयस्टर जैसी किस्मों का उत्पादन किया, जिससे उन्हें तकनीकी समझ और बाजार का अनुभव मिला। जब उन्होंने देखा कि सामान्य फसलों की तुलना में मशरूम खेती में कम जगह, कम पानी और कम लागत में बेहतर मुनाफा मिल सकता है, तो उन्होंने इसे पूर्णकालिक व्यवसाय के रूप में अपनाने का निर्णय लिया। उनकी यह पहल न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।

शिटाके की खासियत और स्वास्थ्य लाभ

अब हिमांशु ने जापान मूल के शिटाके मशरूम की खेती शुरू की है, जिसे औषधीय गुणों के लिए दुनियाभर में सराहा जाता है। यह मशरूम लकड़ी के बुरादे में उगाई जाती है, जो इसे अन्य किस्मों से अलग बनाती है। इसमें उच्च मात्रा में प्रोटीन, जरूरी खनिज तत्व और बीटा ग्लूकान पाया जाता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक माना जाता है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, शिटाके का नियमित सेवन हृदय स्वास्थ्य, पाचन तंत्र और प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए लाभकारी हो सकता है। यही कारण है कि शहरी बाजारों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

उत्पादन प्रक्रिया और समय चक्र

शिटाके मशरूम उगाने की प्रक्रिया नियंत्रित तापमान और नमी पर आधारित होती है। हिमांशु ने अपने शेड में ऐसी व्यवस्था की है, जहां तापमान और आर्द्रता पर लगातार नजर रखी जाती है। लकड़ी के बुरादे में बीजाई करने के बाद मशरूम को तैयार होने में लगभग 30 से 35 दिन का समय लगता है। इस अवधि के दौरान नियमित देखभाल और स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। सही तकनीक और अनुशासन के साथ काम करने पर फसल की गुणवत्ता बेहतर रहती है और उत्पादन भी स्थिर मिलता है।

बाजार और आय संभावनाएं

बाजार में ताजा शिटाके मशरूम की कीमत 800 से 1000 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है, जो इसे बेहद लाभकारी बनाती है। हिमांशु अपनी उपज को स्थानीय मंडियों के साथ-साथ शहरों में भी भेजते हैं, जहां स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता इसे प्राथमिकता देते हैं। प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के जरिए भी इसकी वैल्यू बढ़ाई जा सकती है, जिससे किसानों की आय के नए रास्ते खुलते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि किसान समूह बनाकर उत्पादन करें तो वे बड़े खरीदारों और रिटेल चेन से भी जुड़ सकते हैं।

स्थानीय कृषि पर व्यापक प्रभाव

सहारनपुर में मशरूम उत्पादन का बढ़ता दायरा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहा है। इससे रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं, खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए। हिमांशु जैसे किसान यह साबित कर रहे हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद नवाचार और सही जानकारी से कृषि को लाभकारी बनाया जा सकता है। यदि सरकारी प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता मिलती रहे तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र प्रदेश के लिए एक मजबूत कृषि मॉडल बन सकता है।

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