Success Story – जैविक तरीके से करेले की खेती कर युवक ने कायम की गजब की मिसाल
Success Story – छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के अंबिकापुर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित आमगांव में एक युवा किसान ने पारंपरिक खेती से अलग हटकर अपनी मेहनत और समझदारी से नई पहचान बनाई है। जहां अधिकांश किसान पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं, वहीं इस युवक ने सीमित संसाधनों के बावजूद जैविक तरीके से करेले की खेती कर एक सफल उदाहरण पेश किया है। खास बात यह है कि उसने अपनी पढ़ाई केवल 12वीं तक की है, लेकिन आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर खेती को लाभकारी बना दिया है।

नर्सरी से पौधों के साथ की खेती की शुरुआत
महेंद्र यादव ने अपनी खेती की शुरुआत नर्सरी से पौधे खरीदकर की। उन्होंने करीब एक एकड़ जमीन में करेले की फसल लगाने का निर्णय लिया और लगभग 4.40 रुपये प्रति पौधे की दर से पौधे खरीदे। यह कदम उनके लिए अहम साबित हुआ, क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाले पौधों से फसल की शुरुआती बढ़त बेहतर रही। उन्होंने शुरुआत से ही योजना बनाकर खेती की, जिससे आगे की प्रक्रिया व्यवस्थित तरीके से चल सके।
खेत की तैयारी और जैविक खाद का इस्तेमाल
खेती शुरू करने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई कराई गई और उसके बाद मेड़ तैयार किए गए। इन मेड़ों में गोबर खाद और इको सुपर डीएपी का मिश्रण डाला गया, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सके। इस मिश्रण को करीब एक सप्ताह तक मिट्टी में रहने दिया गया ताकि पोषक तत्व अच्छी तरह घुल-मिल जाएं। जैविक खाद के उपयोग से न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी बल्कि फसल भी अधिक स्वस्थ तरीके से विकसित हुई।
मल्चिंग और सहारा तकनीक से बढ़ी पैदावार
फसल की बेहतर देखभाल के लिए मल्चिंग तकनीक अपनाई गई, जिससे मिट्टी की नमी बरकरार रही और खरपतवार की समस्या कम हुई। इसके साथ ही पौधों को ऊपर चढ़ने के लिए धागों का सहारा दिया गया। इस तकनीक से बेल जमीन से ऊपर रहती है और फल लटककर विकसित होते हैं, जिससे उनके खराब होने की संभावना कम हो जाती है। इससे उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार देखा गया।
फसल तैयार, स्थानीय मंडियों में बढ़ी मांग
महेंद्र यादव ने फरवरी के मध्य में रोपाई की थी और अब उनकी फसल तैयार होकर बाजार में पहुंच रही है। उनकी उपज कमलेश्वरपुर, नवानगर और अंबिकापुर की मंडियों में बेची जा रही है। जब उत्पादन अधिक होता है, तो वे सीधे बड़ी मंडी में जाकर बिक्री करते हैं। स्थानीय बाजार में ताजी और जैविक सब्जियों की मांग बढ़ने से उन्हें अच्छे दाम मिलने की संभावना रहती है।
कम लागत में बेहतर मुनाफे की उम्मीद
इस सीजन में उनकी कुल लागत करीब 40 हजार रुपये रही है। यदि मौसम अनुकूल रहा और फसल अच्छी बनी रही, तो उन्हें लगभग एक लाख रुपये तक का मुनाफा होने की उम्मीद है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि सही योजना और तकनीक के साथ खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।
मौसम के अनुसार फसल चयन की रणनीति
महेंद्र यादव फसल का चयन मौसम को ध्यान में रखकर करते हैं। पहले वे बारिश के मौसम में टमाटर की खेती करते थे और गर्मियों में करेले की फसल लगाते हैं। उनका मानना है कि मौसम के अनुसार फसल चुनने से उत्पादन और बाजार मूल्य दोनों बेहतर मिलते हैं। खासकर बरसात के समय करेले की कीमत अधिक मिलने से लाभ बढ़ सकता है।
मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म से सीखी नई तकनीक
महेंद्र ने खेती की आधुनिक तकनीक किसी संस्थान से नहीं, बल्कि मोबाइल और यूट्यूब के जरिए सीखी। इसके अलावा उन्होंने अन्य किसानों और रिश्तेदारों से भी सलाह ली। डिजिटल माध्यमों ने उन्हें नई जानकारी दी, जिससे उन्होंने अपनी खेती को अधिक प्रभावी बनाया।
बीमारी से निपटकर फसल को बचाया
खेती के दौरान उन्हें फफूंद की समस्या का सामना करना पड़ा, जिससे फसल को नुकसान होने का खतरा था। लेकिन समय रहते दवा का छिड़काव कर स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया। इस अनुभव ने उन्हें सिखाया कि समय पर सही कदम उठाने से नुकसान को टाला जा सकता है।
युवाओं के लिए खेती बना विकल्प
महेंद्र यादव का मानना है कि आज के युवाओं को खेती को एक करियर विकल्प के रूप में देखना चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी के पास जमीन नहीं है, तो वह लीज पर लेकर भी खेती शुरू कर सकता है। सही तकनीक, मेहनत और धैर्य के साथ खेती में अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।