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Strawberry Farming Success story- पश्चिम चंपारण के किसान ने बनाई नई मिसाल

Strawberry Farming – पश्चिम चंपारण जिले के मझौलिया प्रखंड के एक किसान ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर ऐसा रास्ता चुना, जिसने न सिर्फ उनकी आय बढ़ाई बल्कि पूरे इलाके में नई सोच को जन्म दिया। बनकट मुसहरी गांव के निवासी रविकांत पांडे ने स्ट्रॉबेरी की खेती को अपनाकर यह साबित किया है कि अगर योजना, धैर्य और सही जानकारी हो तो बिहार की मिट्टी में भी नकदी फसलें बेहतरीन परिणाम दे सकती हैं। आज उनकी पहचान केवल एक किसान के रूप में नहीं, बल्कि एक सफल उद्यमी के तौर पर भी हो रही है।

Strawberry farming west champaran success

खेती में बदलाव का फैसला

करीब दस वर्षों तक धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करने के बाद रविकांत ने कुछ अलग करने का मन बनाया। आमदनी सीमित थी और लागत बढ़ती जा रही थी। ऐसे में उन्होंने बाजार की मांग और फसलों की संभावनाओं पर अध्ययन किया। इसी दौरान उन्हें स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली। शुरुआत में यह फैसला जोखिम भरा लगा, क्योंकि क्षेत्र में इस फसल की खेती आम नहीं थी। बावजूद इसके उन्होंने एक एकड़ जमीन पर स्ट्रॉबेरी लगाने का निर्णय लिया। अक्टूबर में पौधरोपण किया गया और पूरी प्रक्रिया में लगभग एक लाख रुपये की लागत आई।

पहली ही फसल से मिला उत्साहजनक परिणाम

मार्च में जब पहली बार फसल तैयार हुई तो परिणाम उम्मीद से बेहतर रहा। बाजार में स्ट्रॉबेरी की अच्छी मांग मिली और करीब चार लाख रुपये की आमदनी हुई। इस सफलता ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। धीरे-धीरे उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाया और उत्पादन की तकनीकों को बेहतर बनाया। अब वे सालाना लगभग छह लाख रुपये तक की आय केवल स्ट्रॉबेरी की खेती से अर्जित कर रहे हैं। स्थानीय बाजार के साथ-साथ आसपास के शहरों में भी उनकी उपज की आपूर्ति होने लगी है।

खेती से उद्यमिता की ओर कदम

स्ट्रॉबेरी की खेती से मजबूत आर्थिक आधार मिलने के बाद रविकांत ने कृषि क्षेत्र में और विस्तार की योजना बनाई। इसी सोच के साथ उन्होंने ‘शांभवी बायोटेक’ नाम से अपनी कंपनी की स्थापना की। यह संस्था दुर्लभ और औषधीय गुणों से भरपूर पौधों के उत्पादन और बिक्री का काम करती है। यहां लेमन ग्रास, मियाजाकी आम, गुलमोहर, एडेनियम और तुलसी की विशेष प्रजातियों सहित कई तरह के पौधे तैयार किए जाते हैं। कंपनी में अनुसंधान और विकास से जुड़ा कार्य भी किया जाता है, जिससे किसानों को नई किस्मों और बेहतर उत्पादन तकनीकों की जानकारी मिल सके।

बढ़ती आय और नई पहचान

शांभवी बायोटेक के माध्यम से रविकांत हर वर्ष लगभग 20 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रहे हैं। यदि खेती और कंपनी दोनों की कुल आमदनी को जोड़ा जाए तो यह आंकड़ा 25 से 26 लाख रुपये सालाना तक पहुंच जाता है। उनकी आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है। वे स्थानीय युवाओं को भी रोजगार और प्रशिक्षण देने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि क्षेत्र में आधुनिक कृषि को बढ़ावा मिल सके।

अन्य किसानों के लिए प्रेरणा

रविकांत का मानना है कि खेती में बदलाव समय की जरूरत है। पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नकदी फसलों को अपनाने से आय में वृद्धि संभव है। वे बताते हैं कि सही जानकारी, बाजार की समझ और मेहनत के बिना सफलता संभव नहीं है। उनकी कहानी से यह स्पष्ट होता है कि बिहार जैसे राज्य में भी बागवानी और उच्च मूल्य वाली फसलों के जरिए किसान आत्मनिर्भर बन सकते हैं। स्थानीय कृषि विभाग भी ऐसे प्रयोगों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रहा है।

निष्कर्ष

पश्चिम चंपारण के इस किसान की यात्रा दिखाती है कि नई सोच और जोखिम उठाने का साहस ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। स्ट्रॉबेरी की खेती से शुरू हुआ यह सफर अब एक सफल कृषि-उद्यम में बदल चुका है। यह उदाहरण बताता है कि यदि संसाधनों का सही उपयोग हो और बाजार की मांग को समझकर कदम उठाया जाए, तो खेती केवल जीविका का साधन नहीं बल्कि समृद्धि का मार्ग भी बन सकती है।

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