Organic Farming – नागौर के किसान ने अनार की खेती से लिखी सफलता की नई कहानी
Organic Farming – राजस्थान के नागौर जिले की डेगाना तहसील स्थित आलावास गांव के एक किसान ने जैविक खेती के क्षेत्र में उल्लेखनीय उदाहरण पेश किया है। पूर्व बैंक प्रबंधक रामदेव देवल ने सेवानिवृत्ति के बाद खेती को अपना प्रमुख कार्य बनाया और आधुनिक तकनीकों के साथ अनार की खेती शुरू कर आज अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। सीमित संसाधनों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने खेत को एक सफल जैविक कृषि मॉडल में बदल दिया है।

पारंपरिक खेती से आधुनिक कृषि की ओर बढ़ाया कदम
रामदेव देवल ने बताया कि शुरुआत में उन्होंने सामान्य फसलों की खेती की, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिलने पर उन्होंने बागवानी की दिशा में काम करने का निर्णय लिया। करीब तीन वर्ष पहले उन्होंने अपनी 13 बीघा भूमि पर लगभग 2,000 अनार के पौधे लगाए। नियमित देखभाल और जैविक कृषि पद्धतियों के उपयोग से आज करीब 1,800 पौधे फल उत्पादन कर रहे हैं।
उनका मानना है कि किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए केवल संसाधन ही नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और मजबूत संकल्प भी आवश्यक होते हैं। यही सोच उन्हें खेती में नए प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती रही।
फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्र में तैयार किया सफल मॉडल
नागौर का बड़ा हिस्सा फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्र माना जाता है, जहां भूजल की गुणवत्ता लंबे समय से चिंता का विषय रही है। ऐसे इलाके में फल उत्पादन को सफल बनाना आसान नहीं माना जाता। इसके बावजूद रामदेव देवल ने मिट्टी और पानी की चुनौतियों के अनुरूप खेती की रणनीति अपनाई और धीरे-धीरे बेहतर परिणाम हासिल किए।
स्थानीय किसान भी अब उनके खेत का दौरा कर खेती के तौर-तरीकों को समझने में रुचि दिखा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल चयन और प्रबंधन से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
जैविक तरीकों से पौधों की देखभाल
रामदेव देवल रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय जैविक विकल्पों का उपयोग करते हैं। पौधों को पोषण देने के लिए गोबर की खाद, सड़ी-गली पत्तियों से तैयार खाद और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग किया जाता है। कीट नियंत्रण के लिए वे नीम आधारित घोल का छिड़काव करते हैं, जिससे पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कई कीटों पर नियंत्रण मिलता है।
उनका कहना है कि शुरुआती वर्षों में कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन उन्होंने रासायनिक उपायों की बजाय प्राकृतिक तरीकों को प्राथमिकता दी। इससे फसल की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिली।
रोग प्रबंधन और पोषण संतुलन पर विशेष ध्यान
अनार की खेती में नीमेटोड जैसी बीमारियां किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। इसके अलावा मिट्टी में पोटाश, फास्फोरस, जिंक, कैल्शियम और बोरोन जैसे तत्वों की कमी से फलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। रामदेव देवल ने समय पर पोषक तत्वों की आपूर्ति और जैविक प्रबंधन तकनीकों के माध्यम से इन समस्याओं को नियंत्रित किया।
उनके अनुसार, उचित पोषण और नियमित निगरानी से फल फटने जैसी समस्याओं में कमी लाई जा सकती है। यही कारण है कि उनके बगीचे में फल उत्पादन लगातार बेहतर हो रहा है।
लाखों रुपये की आय का बना स्रोत
किसान के अनुसार, प्रत्येक उत्पादक पौधे से औसतन लगभग 20 किलोग्राम अनार प्राप्त हो रहा है। जैविक तरीके से उगाए गए फलों की मांग स्थानीय बाजारों के साथ-साथ अन्य शहरों में भी बनी हुई है। इसी वजह से उन्हें अपनी उपज का अच्छा मूल्य मिल रहा है।
वर्तमान में वे अनार की खेती से प्रतिवर्ष लगभग 8 से 10 लाख रुपये या उससे अधिक की आय प्राप्त कर रहे हैं। इससे क्षेत्र के अन्य किसानों में भी बागवानी और जैविक खेती के प्रति रुचि बढ़ी है।
फलों की सुरक्षा और जल संरक्षण पर भी फोकस
फलों को तोतों और गिलहरियों से बचाने के लिए रामदेव देवल ने विशेष कवरिंग व्यवस्था की है। उनका कहना है कि बड़े स्तर पर सुरक्षा जाल लगाना महंगा पड़ता है, इसलिए उन्होंने कम लागत वाले विकल्पों का उपयोग किया है।
सिंचाई के लिए उन्होंने खेत में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था भी विकसित की है। फार्म पॉन्ड के माध्यम से एकत्रित पानी का उपयोग फसल की जरूरत के अनुसार किया जाता है। इससे जल संरक्षण के साथ-साथ सिंचाई की उपलब्धता भी सुनिश्चित होती है।
रामदेव देवल की यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, जैविक तकनीकों और निरंतर मेहनत के बल पर किसान बदलती परिस्थितियों में भी सफल कृषि मॉडल विकसित कर सकते हैं।