AGRICULTURE

Turmeric Farming – औषधीय हल्दी की खेती से किसानों ने बनाई नई पहचान

Turmeric Farming – मध्यप्रदेश के खंडवा जिले के अहमदपुर खेगांव गांव के किसान त्रिलोक पाटिल ने खेती में एक अलग राह चुनकर उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वर्षों पहले जहां वे सोयाबीन जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे, वहीं सीमित आय के कारण उन्होंने खेती में बदलाव का फैसला लिया। इसी सोच के साथ उन्होंने हल्दी की खेती शुरू की, जो आज उनके लिए बेहतर आमदनी का मजबूत माध्यम बन चुकी है।

Turmeric farming farmer success story

छोटी शुरुआत से मिली बड़ी सफलता

त्रिलोक पाटिल ने शुरुआत में घरेलू जरूरतों के लिए कम मात्रा में हल्दी लगाई थी। खेती के दौरान उन्हें पता चला कि हल्दी केवल मसाले के रूप में ही नहीं, बल्कि औषधीय उपयोगों के कारण भी बाजार में अच्छी मांग रखती है। इसके बाद उन्होंने एक एकड़ क्षेत्र में इसकी खेती का प्रयोग किया। सकारात्मक परिणाम मिलने पर उन्होंने धीरे-धीरे इसका रकबा बढ़ाकर 4 से 5 एकड़ तक पहुंचा दिया।

आज स्थिति यह है कि उनके खेत में तैयार होने वाला हल्दी का बीज आसपास के कई किसानों के लिए भरोसेमंद स्रोत बन चुका है। क्षेत्र के किसान उनसे बीज लेने के साथ-साथ खेती की तकनीक और प्रबंधन संबंधी जानकारी भी प्राप्त कर रहे हैं।

केवल उत्पादन नहीं, प्रसंस्करण से भी बढ़ाई आय

त्रिलोक पाटिल ने हल्दी की खेती को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने फसल के मूल्य संवर्धन पर भी ध्यान दिया, जिससे उनकी कमाई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वे गीली हल्दी सीधे व्यापारियों को बेचते हैं। इसके अलावा हल्दी को उबालकर, सुखाकर और पॉलिश कर तैयार उत्पाद के रूप में भी बाजार में उपलब्ध कराते हैं।

इतना ही नहीं, हल्दी को पिसवाकर शुद्ध पाउडर के रूप में सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने का काम भी करते हैं। इस तरीके से उन्हें सामान्य बिक्री की तुलना में अधिक लाभ मिलता है और बाजार में उनकी अलग पहचान बनी है।

खेती की अवधि और उत्पादन की संभावनाएं

किसान के अनुसार हल्दी की बुवाई आमतौर पर जून माह के आसपास की जाती है, जबकि इसकी खुदाई मार्च और अप्रैल में होती है। इस तरह यह लगभग 8 से 9 महीने की अवधि वाली फसल मानी जाती है। उचित देखभाल, संतुलित पोषण और जैविक खाद के उपयोग से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

उनका कहना है कि अनुकूल परिस्थितियों में एक एकड़ क्षेत्र से 100 से 150 क्विंटल तक उपज हासिल की जा सकती है। अच्छी गुणवत्ता वाला बीज तैयार होने पर किसान अगले सीजन के लिए स्वयं बीज भी सुरक्षित रख सकते हैं, जिससे खेती की लागत कम करने में मदद मिलती है।

बाजार भाव ने बढ़ाया किसानों का रुझान

त्रिलोक पाटिल के मुताबिक, इस वर्ष हल्दी का बाजार भाव लगभग 20 से 22 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहा। उनका मानना है कि यदि कीमतें 15 से 16 रुपये प्रति किलो के स्तर पर भी रहें, तब भी किसान एक एकड़ क्षेत्र से लगभग डेढ़ लाख से ढाई लाख रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं। यही वजह है कि अब क्षेत्र के कई किसान इस फसल की ओर रुचि दिखा रहे हैं।

औषधीय गुणों के कारण बनी मांग वाली फसल

हल्दी का उपयोग भारतीय रसोई से लेकर पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों तक व्यापक रूप से किया जाता है। दूध, सब्जियों और आयुर्वेदिक उत्पादों में इसकी मांग लगातार बनी रहती है। शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण हल्दी के प्रति उपभोक्ताओं का बढ़ता रुझान किसानों के लिए बेहतर बाजार अवसर तैयार कर रहा है।

नई सोच ने बदली खेती की दिशा

त्रिलोक पाटिल की यात्रा यह दर्शाती है कि खेती में नवाचार और बाजार की जरूरतों को समझकर बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। उन्होंने जोखिम उठाकर जिस फसल को अपनाया, वही आज उनकी आर्थिक मजबूती का आधार बन गई है। साथ ही वे अन्य किसानों को भी वैकल्पिक खेती के जरिए आय बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

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