AGRICULTURE

Soil Health – गुड़ और गोबर के मिश्रण पर शोध ने बढ़ाया किसानों का भरोसा

Soil Health – खेती में लगातार बढ़ते रासायनिक उर्वरकों के उपयोग और मिट्टी की घटती उत्पादकता के बीच गोरखपुर विश्वविद्यालय के कृषि विभाग की एक शोध आधारित पहल किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बनकर उभर रही है। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों का कहना है कि गोबर और गुड़ से तैयार किया गया पारंपरिक मिश्रण मिट्टी की सेहत सुधारने और फसलों के विकास को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस तकनीक को लेकर क्षेत्र के किसानों में भी रुचि बढ़ती दिखाई दे रही है।

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शोध में सामने आए सकारात्मक संकेत

कृषि विभाग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, गोबर में कई प्रकार के प्राकृतिक पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो मिट्टी की संरचना को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। दूसरी ओर, गुड़ मिट्टी में रहने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीवों के लिए ऊर्जा स्रोत का काम करता है। जब दोनों का उपयोग एक साथ किया जाता है तो मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ने लगती हैं, जिससे उसकी उर्वरक क्षमता में सुधार देखा जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी में सक्रिय होने वाले लाभकारी जीवाणु पौधों की जड़ों तक पोषण पहुंचाने में सहायक होते हैं। इससे पौधों की वृद्धि बेहतर हो सकती है और खेत की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रह सकती है।

ऐसे तैयार किया जा सकता है मिश्रण

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को इस मिश्रण को तैयार करने की सरल प्रक्रिया भी बताई है। इसके लिए गोबर, गुड़ और पानी को निश्चित अनुपात में मिलाकर कुछ दिनों तक रखा जाता है, ताकि उसमें जैविक प्रक्रिया पूरी तरह सक्रिय हो सके।

तैयार घोल का उपयोग खेतों में छिड़काव के रूप में या सिंचाई के साथ किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मिश्रण मिट्टी को अधिक भुरभुरा बनाने के साथ-साथ उसकी जैविक गुणवत्ता को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। इससे खेत में पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।

खेती की लागत घटाने में मिल सकती है मदद

कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि इस प्रकार की तकनीकों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। गोबर और गुड़ आसानी से उपलब्ध होने के कारण किसानों को महंगे रासायनिक उर्वरकों पर कम निर्भर रहना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस तरह के जैविक उपायों को नियमित रूप से अपनाया जाए तो मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रह सकती है। इससे खेती की लागत पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और किसानों को आर्थिक रूप से राहत मिल सकती है।

किसानों के बीच बढ़ रही स्वीकार्यता

गोरखपुर और आसपास के कई इलाकों में किसान इस पारंपरिक तकनीक को अपनाने लगे हैं। स्थानीय किसानों का कहना है कि इसके उपयोग के बाद मिट्टी की स्थिति में सुधार महसूस किया गया है और फसलों की गुणवत्ता में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।

कृषि विशेषज्ञ इसे टिकाऊ खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानते हैं। उनका मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित ऐसे उपाय पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भविष्य की कृषि आवश्यकताओं को पूरा करने में भी सहायक साबित हो सकते हैं। इसी वजह से जैविक और प्राकृतिक खेती से जुड़े विकल्पों पर किसानों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

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