AGRICULTURE

MixedFarming – सरगुजा में मेड़ पर खेती से बढ़ रही है किसानों की आमदनी

MixedFarming – छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर क्षेत्र में खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए एक नया प्रयोग किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यहां पारंपरिक तरीके से खेतों में मुख्य फसल लगाने के साथ-साथ अब मेड़ यानी खेत की सीमाओं पर भी फसल उगाने की पहल की जा रही है। इस तरीके से किसान एक ही जमीन से अतिरिक्त उत्पादन लेकर अपनी आय बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

Mixed farming ridge cultivation income

मेड़ पर खेती से दोहरा फायदा मिलने की संभावना

कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में शुरू किए गए इस प्रयोग में खेत की मेड़ों को खाली छोड़ने के बजाय उपयोग में लाया जा रहा है। सामान्यतः किसान इन जगहों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अब यहां सब्जियों और फलों की खेती कर अतिरिक्त उत्पादन लिया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस पद्धति से न केवल मुख्य फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि मेड़ों से मिलने वाली उपज भी किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बनती है। इस तरह एक ही खेत से दोहरा लाभ संभव हो रहा है।

सब्जियों और फलों की खेती से बढ़ रहा उत्पादन

कृषि विशेषज्ञ डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार के अनुसार, किसान मेड़ पर आसानी से कई प्रकार की सब्जियां उगा सकते हैं। इनमें लौकी, बैंगन, मिर्च और गोभी जैसी फसलें शामिल हैं। इसके अलावा फलदार पौधों जैसे ड्रैगन फ्रूट और स्ट्रॉबेरी की खेती भी यहां सफलतापूर्वक की जा सकती है।

इन फसलों का चयन इस आधार पर किया जाता है कि वे कम जगह में बेहतर उत्पादन दे सकें और मुख्य फसल को प्रभावित न करें। इससे किसानों को कम समय में अतिरिक्त उत्पादन मिल जाता है।

कम पानी में बेहतर उत्पादन का मॉडल

मेड़ पर खेती के दौरान पानी का सही प्रबंधन बेहद जरूरी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीक का उपयोग करने से पौधों को जरूरत के अनुसार ही पानी दिया जा सकता है। इससे पानी की बचत होती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है।

पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि हर पौधे को पर्याप्त पोषण मिल सके। इस तरह सीमित संसाधनों में भी अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

जैविक तरीकों से कीट और रोग नियंत्रण

फसल को सुरक्षित रखने के लिए रासायनिक कीटनाशकों के बजाय जैविक उपायों को प्राथमिकता दी जा रही है। कृषि विशेषज्ञ नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और दशपर्णी अर्क जैसे पारंपरिक जैविक घोलों के उपयोग की सलाह देते हैं।

इनका इस्तेमाल न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित है, बल्कि इससे फसल की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रहती है। खासकर घरेलू उपयोग और स्थानीय बाजार के लिए यह तरीका अधिक उपयोगी माना जा रहा है।

खरपतवार नियंत्रण के साथ अतिरिक्त आमदनी

खेत की मेड़ों को खाली छोड़ देने पर वहां खरपतवार उग आते हैं, जो मुख्य फसल के पोषण पर असर डाल सकते हैं। लेकिन यदि इन जगहों पर सब्जी या फल उगाए जाएं, तो यह समस्या काफी हद तक कम हो जाती है।

इससे किसानों को दोहरा लाभ मिलता है—एक ओर खरपतवार पर नियंत्रण रहता है और दूसरी ओर अतिरिक्त उत्पादन के जरिए आय बढ़ती है। यह तरीका छोटे और सीमांत किसानों के लिए खासतौर पर उपयोगी साबित हो रहा है।

बाजार में जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग

मेड़ पर उगाई गई फसलें यदि जैविक तरीके से तैयार की जाएं, तो बाजार में उनकी मांग अधिक होती है। उपभोक्ता अब स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं, जिसके चलते जैविक उत्पादों को बेहतर कीमत मिल रही है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान इस मॉडल को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपनी लागत घटा सकते हैं, बल्कि बाजार में बेहतर दाम पाकर अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानी जा रही है।

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