AGRICULTURE

Longan – बिहार में बढ़ रही है इस विदेशी फल की खेती की संभावनाएं

Longan – बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसे विदेशी फल की सफल पैदावार की है, जिसने किसानों और बागवानी से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। यह फल दिखने और स्वाद में काफी हद तक लीची जैसा माना जा रहा है। खास बात यह है कि अब तक इसकी पहचान मुख्य रूप से चीन, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों तक सीमित थी, लेकिन अब बिहार की जलवायु में भी इसकी खेती की संभावनाएं मजबूत दिखाई दे रही हैं।

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कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों के अनुसार इस फल का नाम ‘लोंगन’ है। स्थानीय स्तर पर इसे कई लोग लीची का छोटा भाई भी कह रहे हैं, क्योंकि इसके पेड़, पत्तियां और स्वाद काफी हद तक लीची से मेल खाते हैं। हालांकि आकार और बाहरी रंग में कुछ अंतर साफ दिखाई देता है।

लीची के बाद बाजार में बढ़ सकती है मांग

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि लोंगन की सबसे बड़ी खासियत इसका फलने का समय है। जब बाजार में लीची का सीजन समाप्त होने लगता है, तब लोंगन के पेड़ों पर फल आना शुरू होते हैं। इससे किसानों को लंबे समय तक फल बाजार में उपलब्ध कराने का अवसर मिल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक स्वाद में यह फल मीठा और रसदार होता है। जहां लीची का रंग लाल और आकार थोड़ा लंबा होता है, वहीं लोंगन आकार में छोटा और गोल दिखाई देता है। इसका बाहरी छिलका हल्के भूरे और हरे रंग का होता है। फल के स्वाद और बनावट को देखते हुए इसे लीची का विकल्प भी माना जा रहा है।

बिहार की जलवायु खेती के लिए उपयुक्त

कृषि विभाग से जुड़े अधिकारियों और वैज्ञानिकों का मानना है कि बिहार की मिट्टी और मौसम लोंगन की खेती के लिए अनुकूल हैं। पश्चिम चम्पारण सहित राज्य के कई हिस्सों में इसकी बागवानी आसानी से की जा सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस फल में सामान्य तौर पर कीटों का प्रकोप कम देखने को मिलता है, जिससे किसानों की लागत घट सकती है।

अगर किसान इसकी खेती शुरू करते हैं तो पौधरोपण के लगभग दो साल बाद पेड़ों पर फल आने लगते हैं। यही वजह है कि इसे दीर्घकालिक बागवानी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार कम देखभाल में भी इसकी अच्छी वृद्धि संभव है।

रोपाई की प्रक्रिया लीची जैसी

लोंगन की खेती का तरीका काफी हद तक लीची की बागवानी जैसा माना जाता है। इसके लिए पहले खेत में गड्ढे तैयार किए जाते हैं और फिर पौधों की रोपाई की जाती है। मई और जून के दौरान खेत की तैयारी की जाती है, जबकि जुलाई का समय पौधरोपण के लिए उपयुक्त माना गया है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि एक साल पुराने पौधों से भी इसकी खेती शुरू की जा सकती है। इसके पौधे बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित लीची अनुसंधान केंद्र में उपलब्ध हैं। बागवानी विशेषज्ञ किसानों को प्रमाणित पौधे लेने की सलाह दे रहे हैं ताकि बेहतर उत्पादन मिल सके।

पोषण के लिहाज से भी फायदेमंद

लोंगन केवल स्वाद के कारण ही नहीं बल्कि अपने पोषक तत्वों की वजह से भी चर्चा में है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस फल में विटामिन C अच्छी मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा इसमें फाइबर, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि इसमें मौजूद पोषक तत्व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी मांग लगातार बनी रहती है। भारत में इसकी खेती बढ़ने पर किसानों के लिए निर्यात के अवसर भी खुल सकते हैं।

किसानों के लिए नई संभावना

बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक फसलों के साथ-साथ विदेशी फलों की खेती किसानों की आय बढ़ाने में मददगार हो सकती है। बदलती कृषि जरूरतों और बाजार मांग को देखते हुए अब कई किसान नई फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

लोंगन की सफल खेती अगर बड़े स्तर पर शुरू होती है तो बिहार के किसानों को एक नया विकल्प मिल सकता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि उचित तकनीक और सही देखभाल के साथ यह फल आने वाले वर्षों में व्यावसायिक बागवानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

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