Geranium Farming – कम पानी में अधिक आमदनी दे रही है इस सुगंधित फसल की खेती
Geranium Farming – खेती के बदलते स्वरूप के बीच किसान अब ऐसी फसलों की तलाश कर रहे हैं जो कम संसाधनों में बेहतर आर्थिक लाभ दे सकें। इसी क्रम में जेरेनियम की खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है। सुगंधित पौधों की श्रेणी में आने वाली यह फसल अपने तेल के कारण बाजार में विशेष पहचान रखती है। इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन और विभिन्न सुगंधित उत्पादों के निर्माण में इसका व्यापक उपयोग होता है। यही वजह है कि इसकी खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक आकर्षक विकल्प बनती जा रही है।

सुगंधित तेल के कारण बढ़ी मांग
जेरेनियम को कई जगहों पर ‘गरीबों का गुलाब’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसके पौधों से प्राप्त तेल में गुलाब जैसी सुगंध होती है। बाजार में इस तेल की अच्छी मांग बनी रहती है और इसकी कीमत कई बार 12 हजार से 20 हजार रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाती है। बढ़ती औद्योगिक जरूरतों के चलते इस फसल का महत्व लगातार बढ़ रहा है। सरकार भी विभिन्न योजनाओं और एरोमा मिशन के माध्यम से किसानों को सुगंधित फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
खेती के लिए अनुकूल वातावरण
विशेषज्ञों के अनुसार जेरेनियम की अच्छी वृद्धि के लिए मध्यम तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। लगभग 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान इसकी खेती के लिए बेहतर रहता है। अत्यधिक ठंड और पाले से फसल को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए सावधानी जरूरी होती है। मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट भूमि इसके लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। भूमि का पीएच मान 6 से 7.5 के बीच होने पर पौधों का विकास बेहतर देखा जाता है।
रोपाई से पहले खेत की तैयारी जरूरी
सफल उत्पादन के लिए खेत की उचित तैयारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बुवाई से पहले खेत की कई बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी और समतल बनाया जाता है। रोपण के लिए स्वस्थ और विकसित कलमों का चयन किया जाता है, जिनकी लंबाई सामान्यतः 10 से 15 सेंटीमीटर रखी जाती है। उपचारित कलमों को निर्धारित दूरी पर कतारों में लगाया जाता है ताकि पौधों को पर्याप्त जगह और पोषण मिल सके। अक्टूबर-नवंबर तथा फरवरी-मार्च का समय इसकी रोपाई के लिए अनुकूल माना जाता है।
सीमित सिंचाई में भी अच्छी पैदावार
जेरेनियम की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे अन्य कई फसलों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। मौसम और मिट्टी की नमी को ध्यान में रखते हुए सिंचाई की जाती है। गर्मी के मौसम में अपेक्षाकृत कम अंतराल पर और सर्दियों में अधिक अंतराल पर पानी देना पर्याप्त रहता है। खेत में जलभराव की स्थिति से बचना आवश्यक है, क्योंकि इससे पौधों की जड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बेहतर उत्पादन के लिए गोबर की सड़ी खाद के साथ संतुलित मात्रा में आवश्यक पोषक तत्वों का उपयोग लाभकारी माना जाता है।
एक वर्ष में कई बार मिल सकता है उत्पादन
रोपाई के लगभग चार महीने बाद फसल की पहली कटाई की जा सकती है। कटाई के दौरान पौधों की पत्तियों और ऊपरी भाग को सावधानीपूर्वक काटा जाता है, जिससे पौधे दोबारा तेजी से विकसित हो सकें। यही कारण है कि एक बार रोपाई के बाद किसान साल में तीन से चार बार तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इससे उन्हें नियमित अंतराल पर आय का अवसर मिलता है और नकदी प्रवाह बना रहता है।
तेल निष्कर्षण से बढ़ती है कमाई
जेरेनियम की वास्तविक आर्थिक क्षमता इसके तेल से जुड़ी होती है। पत्तियों और कोमल भागों से तेल निकालने के लिए भाप आधारित आसवन तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में प्राप्त तेल को विभिन्न उद्योगों में उपयोग किया जाता है, जिससे इसकी बाजार कीमत बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान आधुनिक तकनीकों और उचित प्रबंधन के साथ इसकी खेती करें तो यह फसल उनकी आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।