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AGRICULTURE

Fish Feed – वैज्ञानिक आहार प्रबंधन से मछली पालन की पैदावार बढ़ाने का नया नजरिया

Fish Feed – मछली पालन आज केवल पारंपरिक व्यवसाय नहीं रहा, बल्कि यह योजनाबद्ध कृषि-आधारित उद्योग का रूप ले चुका है। तालाब की तैयारी, जल प्रबंधन और नस्ल चयन जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही निर्णायक पहलू मछलियों का आहार है। सही पोषण न मिलने पर मछलियों की वृद्धि धीमी पड़ जाती है, बीमारियों का खतरा बढ़ता है और अंततः उत्पादन प्रभावित होता है। वहीं, संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से दिया गया आहार न केवल मछलियों को स्वस्थ रखता है, बल्कि किसानों की लागत घटाकर मुनाफा भी बढ़ाता है। कृषि विज्ञान केंद्र, जांजगीर-चांपा के मत्स्य विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप कुमार सिंह के अनुसार, आहार प्रबंधन को मछली पालन की रीढ़ माना जाना चाहिए, क्योंकि इसी पर पूरी उत्पादन प्रणाली टिकी होती है।

Fish feed scientific management higher yield

प्रजाति के अनुसार आहार चुनने की जरूरत

डॉ. सिंह बताते हैं कि मछलियों के लिए एक ही तरह का आहार हर परिस्थिति में उपयुक्त नहीं होता। तालाब में पाली जा रही प्रजाति के जैविक स्वभाव और पोषण आवश्यकता के आधार पर फीड का चयन किया जाना चाहिए। सामान्य कार्प प्रजातियां—जैसे रोहू, कतला और मृगल—तुलनात्मक रूप से कम प्रोटीन पर भी अच्छी तरह विकसित हो जाती हैं। इनके लिए 18 से 20 प्रतिशत प्रोटीन युक्त तैयार आहार बाजार में आसानी से मिल जाता है और छोटे-मध्यम किसानों के लिए यह किफायती विकल्प माना जाता है। दूसरी ओर, पंगास जैसी तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों को अधिक ऊर्जा और प्रोटीन की जरूरत पड़ती है, इसलिए इनके लिए लगभग 25 प्रतिशत प्रोटीन वाला आहार बेहतर माना जाता है।

फ्लोटिंग फीड क्यों बन रहा पसंदीदा विकल्प

पिछले कुछ वर्षों में तैरने वाले आहार यानी फ्लोटिंग फीड का चलन तेजी से बढ़ा है। यह पानी की सतह पर तैरता रहता है, जिससे किसान प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं कि मछलियां कितना खा रही हैं। यदि 10–15 मिनट के भीतर पूरा आहार खत्म हो जाता है, तो यह संकेत होता है कि मात्रा सही है; यदि बच जाता है, तो अगली बार मात्रा कम की जा सकती है। इससे न केवल भोजन की बर्बादी रुकती है, बल्कि पानी की गुणवत्ता भी बनी रहती है, क्योंकि बचा हुआ आहार सड़कर तालाब को प्रदूषित नहीं करता।

जूट बैग से आहार देने की पारंपरिक लेकिन कारगर पद्धति

जहां फ्लोटिंग फीड उपलब्ध नहीं है या किसान लागत कम रखना चाहते हैं, वहां जूट बैग का उपयोग आज भी प्रभावी माना जाता है। इसमें आहार भरकर तालाब के निर्धारित स्थानों पर बांध दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक एकड़ तालाब में 8 से 9 जगहों पर जूट बैग टांगना उचित रहता है। इससे मछलियां एक ही स्थान पर भोजन करने की आदत डाल लेती हैं और पूरे तालाब में बिखराव नहीं होता। जो आहार बैग से धीरे-धीरे नीचे गिरता है, उसे मृगल और कॉमन कार्प जैसी तलहटी में रहने वाली मछलियां खा लेती हैं, जिससे कुल मिलाकर पोषण का पूरा उपयोग हो जाता है।

नियमित स्थान और समय का महत्व

बार-बार भोजन देने का स्थान बदलने से मछलियां असहज हो जाती हैं और झुंड बनाकर भोजन करने की प्रवृत्ति विकसित नहीं कर पातीं। इससे कुछ मछलियां अधिक खा लेती हैं और कुछ कमजोर रह जाती हैं। इसलिए समय और स्थान दोनों में नियमितता बनाए रखना वैज्ञानिक दृष्टि से जरूरी माना जाता है। सुबह या शाम के ठंडे समय में आहार देना अधिक लाभकारी होता है, क्योंकि इस दौरान मछलियों की सक्रियता अधिक रहती है।

शरीर के वजन के अनुसार आहार मात्रा

आहार की सही मात्रा तय करना उतना ही अहम है जितना सही आहार चुनना। सामान्य तौर पर मछलियों को उनके कुल जैविक वजन का 2 से 4 प्रतिशत तक आहार दिया जाता है। छोटी मछलियों को अपेक्षाकृत अधिक मात्रा की जरूरत होती है, जबकि बड़ी मछलियों के लिए यह प्रतिशत घटता जाता है। उदाहरण के लिए, यदि तालाब में कुल 100 किलो मछली है, तो प्रतिदिन लगभग 3 से 4 किलो आहार पर्याप्त माना जाता है। जैसे-जैसे मछलियों का वजन बढ़ता है, यह अनुपात धीरे-धीरे कम कर दिया जाता है।

वजन बढ़ने पर रणनीति में बदलाव

जब मछलियों का औसत वजन 500 ग्राम तक पहुंच जाता है, तब उन्हें लगभग 3 प्रतिशत आहार दिया जाता है। 500 ग्राम से अधिक होने पर यह मात्रा घटाकर 2 प्रतिशत कर दी जाती है। यदि मछलियां 1 किलो से ऊपर पहुंच जाती हैं, तो सामान्यतः उनके शरीर के वजन का करीब 1.5 प्रतिशत आहार ही पर्याप्त होता है। यह पद्धति न केवल पोषण संतुलन बनाए रखती है, बल्कि उत्पादन लागत को भी नियंत्रित करती है।

बेहतर उत्पादन के लिए समग्र दृष्टिकोण

विशेषज्ञों का मानना है कि सफल मछली पालन किसी एक कारक पर निर्भर नहीं करता। सही नस्ल, स्वच्छ पानी, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक आहार प्रबंधन—इन सभी का संतुलन जरूरी है। यदि किसान प्रजाति के अनुसार उपयुक्त प्रोटीन स्तर वाला आहार चुनें, सही समय पर सही मात्रा दें और फीड देने की विधि का ध्यान रखें, तो उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ मुनाफा भी सुनिश्चित होता है।

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