Farming – कम लागत में किसानों को फायदा दे रही है देसी करेले की खेती
Farming – बढ़ती खेती लागत और मौसम की अनिश्चितता के बीच कई किसान अब ऐसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिनमें कम निवेश के साथ बेहतर आमदनी की संभावना हो। इसी कड़ी में गांव के किसान मोहन ने देसी करेले की खेती से अच्छी कमाई का उदाहरण पेश किया है। उन्होंने करीब दो बीघा जमीन में बेहद कम लागत से खेती शुरू की और अब इस फसल से हजारों रुपये की आय की उम्मीद जता रहे हैं।

मोहन का कहना है कि देसी करेला स्वाद और मांग दोनों मामलों में हाइब्रिड किस्मों से आगे माना जाता है। यही वजह है कि मंडियों में इसकी बिक्री जल्दी हो जाती है और कीमत भी बेहतर मिलती है। उनका दावा है कि शुरुआती खर्च करीब एक हजार रुपये रहा, जबकि पूरे सीजन में करीब 50 हजार रुपये तक की कमाई संभव है।
सही मौसम में बुवाई से बढ़ता है उत्पादन
किसान मोहन के अनुसार देसी करेले की खेती गर्मी और बारिश दोनों मौसम में की जा सकती है। इसकी बुवाई फरवरी से अप्रैल और जून से जुलाई के बीच सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यदि मौसम संतुलित रहे और समय पर देखभाल की जाए तो पौधों की बढ़वार तेज होती है और उत्पादन भी अच्छा मिलता है।
उन्होंने बताया कि करेले की खेती बहुत कठिन नहीं होती, लेकिन खेत की शुरुआती तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी का भुरभुरा और जल निकासी वाला होना जरूरी माना जाता है।
खेत की तैयारी में गोबर खाद फायदेमंद
मोहन बताते हैं कि बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई की जाती है ताकि मिट्टी नरम हो जाए। इसके बाद खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाई जाती है, जिससे पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलता है और बेलों की वृद्धि बेहतर होती है।
खेत में छोटे-छोटे बेड या मेड़ तैयार किए जाते हैं ताकि बारिश या सिंचाई का पानी जमा न हो। किसानों के अनुसार करेले की फसल में जलभराव सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इसलिए खेत में पानी की निकासी की उचित व्यवस्था जरूरी होती है।
पौधों की दूरी और समय पर देखभाल जरूरी
करेले के बीज आमतौर पर दो से तीन फीट की दूरी पर लगाए जाते हैं, जबकि कतारों के बीच पांच से छह फीट की जगह छोड़ी जाती है। इससे बेलों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और हवा का संचार भी बना रहता है।
बीज लगाने के लगभग एक सप्ताह बाद अंकुरण शुरू हो जाता है। करीब 50 से 60 दिनों में फसल तैयार होने लगती है और फिर कई महीनों तक लगातार तुड़ाई की जा सकती है। मोहन के मुताबिक बाजार में देसी करेले की कीमत 30 से 50 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है, जिससे किसानों को अच्छा लाभ मिलता है।
मचान तकनीक से फसल को मिल रहा फायदा
मोहन ने अपनी खेती में मचान पद्धति का उपयोग भी किया है। इस तकनीक में बांस, तार और रस्सियों की सहायता से ऊपर जाल जैसा ढांचा तैयार किया जाता है, जिस पर करेले की बेलें चढ़ाई जाती हैं।
उनका कहना है कि मचान पर बेलें बढ़ने से फसल जमीन को नहीं छूती, जिससे सड़न और बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। साथ ही धूप और हवा सभी पौधों तक समान रूप से पहुंचती है, जिससे उत्पादन में सुधार देखने को मिलता है।
बाजार में बढ़ रही देसी करेले की मांग
मोहन का मानना है कि देसी करेले की सबसे बड़ी ताकत इसकी मांग है। गांवों के साथ शहरों में भी लोग स्वाद और गुणवत्ता के कारण इसे अधिक पसंद कर रहे हैं। मंडियों में भी इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है, जिससे छोटे किसान कम लागत में बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
उन्होंने बताया कि समय पर सिंचाई, निराई-गुड़ाई और बेलों की नियमित देखभाल करने से उत्पादन लगातार अच्छा बना रहता है। कई किसान अब पारंपरिक खेती के साथ इस तरह की सब्जी फसलों को अपनाकर अतिरिक्त आय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।