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AGRICULTURE

CapsicumFarming – बाराबंकी में शिमला मिर्च से बढ़ी किसानों की आय

CapsicumFarming – उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में सब्जी खेती ने किसानों की आमदनी को नया सहारा दिया है। खासकर शिमला मिर्च की खेती ने कई परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का रास्ता खोला है। सहेलियां गांव के किसान शेखर ने पारंपरिक धान और गेहूं की खेती के साथ प्रयोग करते हुए शिमला मिर्च उगाना शुरू किया और अब यह निर्णय उनके लिए लाभदायक साबित हो रहा है। सीमित जमीन में की गई इस पहल से उन्हें एक सीजन में 80 से 90 हजार रुपये तक की कमाई हो रही है।

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पारंपरिक खेती से आगे बढ़ने का फैसला

शेखर बताते हैं कि पहले उनकी पूरी निर्भरता धान और गेहूं पर थी। इन फसलों से सालभर का गुजारा तो हो जाता था, लेकिन अतिरिक्त आमदनी की गुंजाइश कम रहती थी। बाजार में सब्जियों की बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने कुछ अलग करने की सोची। स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेने के बाद उन्होंने आधे एकड़ में शिमला मिर्च की खेती शुरू की। शुरुआत में थोड़ी आशंका जरूर थी, लेकिन परिणाम उम्मीद के मुताबिक रहे।

कम लागत में बेहतर उत्पादन

किसान के अनुसार एक बीघे में शिमला मिर्च की खेती पर लगभग 20 से 22 हजार रुपये का खर्च आता है। इसमें बीज, नर्सरी तैयार करना, खेत की जुताई, खाद और सिंचाई शामिल है। सही समय पर पौध रोपाई और देखभाल से उत्पादन अच्छा मिलता है। यह फसल रोपाई के करीब दो महीने बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है और तीन से चार महीने तक लगातार उत्पादन देती रहती है। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत मानी जा रही है।

सर्दियों में मिलता है अच्छा दाम

स्थानीय बाजार में शिमला मिर्च की मांग पूरे साल बनी रहती है, लेकिन सर्दियों के मौसम में कीमतें बेहतर मिलती हैं। शेखर का कहना है कि जब आपूर्ति कम होती है, तब दाम बढ़ जाते हैं और किसानों को सीधा लाभ मिलता है। उनकी उपज को आसपास के बाजारों में आसानी से खपाया जा रहा है। मांग स्थिर रहने से बिक्री में भी कोई खास परेशानी नहीं आती।

खेती की प्रक्रिया पर खास ध्यान

शिमला मिर्च की खेती के लिए सबसे पहले अच्छी गुणवत्ता के बीज से नर्सरी तैयार की जाती है। लगभग एक महीने बाद तैयार पौधों को खेत में रोपा जाता है। खेत की गहरी जुताई कर जैविक और रासायनिक खाद का संतुलित प्रयोग किया जाता है। नियमित सिंचाई और कीट नियंत्रण से पौधों की सेहत बनी रहती है। शेखर बताते हैं कि समय पर देखभाल से फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है, जिससे बाजार में उचित मूल्य मिलता है।

अन्य किसानों में बढ़ी रुचि

शेखर की सफलता के बाद आसपास के कई किसान भी सब्जी खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र की मिट्टी और मौसम शिमला मिर्च के लिए अनुकूल है। अगर वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो कम जमीन में भी अच्छी आमदनी संभव है। विभाग समय-समय पर प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध करा रहा है।

ग्रामीण आय में सकारात्मक बदलाव

शिमला मिर्च जैसी नगदी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही हैं। कम समय में तैयार होने वाली और लंबे समय तक उत्पादन देने वाली यह फसल किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन रही है। शेखर अब आने वाले सीजन में क्षेत्रफल बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। उनका मानना है कि अगर बाजार की मांग और सही तकनीक को ध्यान में रखा जाए तो खेती लाभ का सौदा बन सकती है।

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