Apple Farming – बिहार में बढ़ रही है सेब की खेती, किसानों को मिल रहे हैं बेहतर दाम
Apple Farming – एक समय ऐसा था जब बिहार में सेब पूरी तरह दूसरे राज्यों से मंगाया जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है। राज्य के कई जिलों में किसान बड़े पैमाने पर सेब की बागवानी कर रहे हैं और अच्छी उपज भी प्राप्त कर रहे हैं। पश्चिम चम्पारण, गया, बेगूसराय और मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्रों में सेब की खेती धीरे-धीरे एक नए कृषि विकल्प के रूप में उभर रही है। खास बात यह है कि गर्म जलवायु वाले इलाकों में भी यह फसल सफल साबित हो रही है।

किसानों को मिल रही उत्साहजनक सफलता
पश्चिम चम्पारण जिले के बैकुंठवा गांव के किसान शिशिर दुबे उन किसानों में शामिल हैं जिन्होंने कुछ वर्ष पहले सेब की खेती की शुरुआत की थी। उन्होंने करीब दो वर्ष पहले अपने खेत में लगभग 70 सेब के पौधे लगाए थे। अब ये पौधे फल देने लगे हैं और प्रत्येक पेड़ से औसतन 8 से 10 किलो तक उत्पादन प्राप्त हो रहा है। उनका कहना है कि फल की गुणवत्ता और स्वाद किसी भी पारंपरिक सेब उत्पादक क्षेत्र के सेब से कम नहीं है।
बाजार में पहले पहुंच रहा स्थानीय उत्पादन
बिहार में उगाए जा रहे सेब की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी समय से पहले उपलब्धता है। जहां पहाड़ी और ठंडे इलाकों में सेब की तुड़ाई आमतौर पर सितंबर और अक्टूबर में होती है, वहीं बिहार जैसे गर्म क्षेत्रों में इसकी फसल जून और जुलाई के दौरान तैयार हो जाती है। इससे किसानों को बाजार में जल्दी प्रवेश मिलता है और बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
अच्छी कीमत से बढ़ा किसानों का रुझान
स्थानीय बाजारों में इस समय बिहार में उत्पादित सेब की कीमत 200 रुपये प्रति किलो तक पहुंच रही है। कुछ स्थानों पर यह 250 रुपये प्रति किलो के आसपास भी बिक रहा है। किसानों का कहना है कि मांग अच्छी होने के कारण उपभोक्ता इस कीमत पर भी खरीदारी कर रहे हैं। इससे सेब की खेती किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनती जा रही है।
स्वाद और गुणवत्ता में नहीं दिखता अंतर
कृषकों के अनुसार, गर्म क्षेत्रों में उगाए जा रहे सेब का स्वाद मीठा और रसदार होता है। फल का रंग भी पूरी तरह पकने के बाद गहरा लाल हो जाता है। शुरुआती अवस्था में यह हरे रंग का दिखाई देता है, लेकिन पकने के साथ इसका स्वरूप पारंपरिक सेब जैसा हो जाता है। यही वजह है कि उपभोक्ता इसे आसानी से स्वीकार कर रहे हैं।
कई जिलों में बढ़ रहा खेती का दायरा
पश्चिम चम्पारण के अलावा अन्य जिलों के किसान भी इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। बेतिया के मेराजुल हक, मझौलिया के रविकांत पांडे और रामनगर के विजय गिरी जैसे किसान भी अपने बगीचों में सेब के पौधे लगाकर उत्पादन कर रहे हैं। उनके अनुभव बताते हैं कि सही देखभाल के साथ यह फसल गर्म क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।
ऊंचे तापमान में भी बेहतर विकास
किसानों के अनुसार, यहां जिस किस्म की खेती की जा रही है, वह HRMN 99 नाम से जानी जाती है। यह किस्म अधिक तापमान को सहन करने की क्षमता रखती है। बताया जाता है कि 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी में भी पौधों का विकास सामान्य रूप से होता है। पौधारोपण के एक से दो वर्ष के भीतर फल आना शुरू हो जाता है, जिससे किसानों को अपेक्षाकृत कम समय में उत्पादन और आय प्राप्त होने लगती है।