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MushroomFarming – बिहार की महिला किसान ने खड़ा किया करोड़ों का सफल कारोबार

MushroomFarming – बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रहने वाली मनोरमा सिंह ने कृषि क्षेत्र में एक ऐसी पहचान बनाई है, जो आज कई किसानों और ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुई उनकी मशरूम खेती अब बड़े स्तर के कृषि उद्यम में बदल चुकी है। लगातार प्रयास, तकनीकी प्रशिक्षण और बाजार की समझ के बल पर उन्होंने ऐसा मुकाम हासिल किया कि लोग उन्हें आज “मशरूम क्वीन” के नाम से जानते हैं।

Bihar woman mushroom farming success

खेती के प्रति बचपन से था विशेष लगाव

मनोरमा सिंह का संबंध मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड के बखरा क्षेत्र से है। उन्होंने मनोविज्ञान और पेंटिंग विषय में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1991 में विवाह के बाद वे वैशाली जिले के लालगंज क्षेत्र में रहने लगीं। कृषि और नवाचार में रुचि होने के कारण उन्होंने पारंपरिक खेती के साथ पशुपालन, वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन और अन्य छोटे व्यवसायों में भी हाथ आजमाया। साथ ही वे बच्चों को पेंटिंग सिखाने का काम भी करती थीं।

एक अनुभव से बदली करियर की दिशा

वर्ष 2009 में एक होटल में मशरूम से बनी डिश खाने के बाद उनके मन में मशरूम उत्पादन को लेकर रुचि पैदा हुई। इसके बाद उन्होंने इस विषय पर जानकारी जुटानी शुरू की और कृषि विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लिया। आगे चलकर उन्होंने राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। विशेषज्ञों के सहयोग से उन्होंने इस क्षेत्र की तकनीकी बारीकियां सीखीं और व्यवसायिक स्तर पर खेती करने का निर्णय लिया।

शुरुआती दौर में मिलीं कई चुनौतियां

मनोरमा सिंह ने वर्ष 2010 में केवल 200 बैग के साथ मशरूम उत्पादन शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। पहली फसल में लागत तक नहीं निकल सकी, जबकि दूसरी बार उत्पादन बेहतर होने के बावजूद बाजार की कमी सामने आई। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में मशरूम को लेकर जागरूकता काफी कम थी और लोग इसे खरीदने से हिचकिचाते थे।

जागरूकता से बढ़ी मांग

बाजार की चुनौती से घबराने के बजाय उन्होंने लोगों को मशरूम के पोषण और उपयोगिता के बारे में बताना शुरू किया। उन्होंने अपने परिचितों, रिश्तेदारों और गांव के लोगों को मशरूम चखने और इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया। धीरे-धीरे लोगों की सोच बदली और स्थानीय स्तर पर मांग बढ़ने लगी। यही बदलाव उनके व्यवसाय के विस्तार की नींव बना।

उत्तर बिहार में स्थापित की स्पॉन लैब

मशरूम उत्पादन को नई ऊंचाई देने के लिए मनोरमा सिंह ने स्पॉन यानी बीज उत्पादन का प्रशिक्षण भी हासिल किया। उन्नत तकनीक सीखने के बाद उन्होंने वर्ष 2014 में उत्तर बिहार की पहली मशरूम स्पॉन लैब स्थापित की। इस पहल ने उन्हें न केवल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों को भी गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने का अवसर दिया।

आधुनिक तकनीक से हो रहा बड़े पैमाने पर उत्पादन

वर्तमान में उनका कृषि उद्यम लगभग 7 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां आधुनिक सुविधाओं से लैस 12 वातानुकूलित उत्पादन कक्षों में बटन, ऑयस्टर और मिल्की मशरूम की खेती की जाती है। प्रतिदिन करीब एक टन मशरूम का उत्पादन किया जा रहा है। इस पूरे व्यवसाय में उनके परिवार के सदस्य भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

किसानों को भी बना रहीं आत्मनिर्भर

मनोरमा सिंह केवल अपने व्यवसाय तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने उत्तर बिहार के हजारों किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार की दिशा में प्रेरित किया है। कृषि विभाग और विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से वे ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक खेती के प्रति जागरूकता फैलाने का काम भी कर रही हैं।

कई प्रतिष्ठित सम्मान से हुईं सम्मानित

कृषि क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें विभिन्न राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं। नवाचार आधारित खेती और किसानों के प्रशिक्षण में उनकी भूमिका को कई संस्थाओं ने सराहा है। उनकी सफलता इस बात का उदाहरण है कि सही प्रशिक्षण, धैर्य और दूरदृष्टि के साथ कृषि को लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।

करोड़ों रुपये तक पहुंचा कारोबार

मनोरमा सिंह के अनुसार, वर्तमान में उनके मशरूम व्यवसाय का वार्षिक कारोबार लगभग 3.6 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इस उद्यम से उन्हें हर वर्ष करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। उनकी यात्रा यह साबित करती है कि आधुनिक कृषि और उद्यमशीलता के मेल से ग्रामीण क्षेत्रों में भी बड़े आर्थिक अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

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