Organic Farming – दरभंगा के किसान ने वर्मी कंपोस्ट से बनाई सफल आय की नई राह
Organic Farming – रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग के बीच बिहार के दरभंगा जिले के एक किसान ने जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक अलग पहचान बनाई है। प्रगतिशील किसान आदित्य कुमार ने वर्मी कंपोस्ट उत्पादन को न केवल खेती का हिस्सा बनाया, बल्कि इसे एक सफल व्यवसाय में भी बदल दिया। आज उनके द्वारा तैयार किया गया जैविक खाद दरभंगा सहित आसपास के कई जिलों में पहुंच रहा है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

सिक्किम में मिला जैविक खेती का अनुभव
आदित्य कुमार ने बताया कि कुछ वर्ष पहले वे सिक्किम में निजी क्षेत्र में कार्यरत थे। वहां उन्होंने देखा कि अधिकांश किसान रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक तरीकों को प्राथमिकता देते हैं। खासतौर पर वर्मी कंपोस्ट का व्यापक उपयोग उन्हें काफी प्रभावित कर गया। खेती में बेहतर गुणवत्ता वाली फसल और मिट्टी की अच्छी स्थिति देखकर उन्होंने अपने गांव लौटकर इसी दिशा में काम करने का निर्णय लिया।
सरकारी सहयोग मिलने के बाद उन्होंने वर्मी कंपोस्ट उत्पादन की शुरुआत की। शुरुआती चरण में उन्होंने अपने खेतों में तैयार खाद का उपयोग किया, जहां सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। फसल उत्पादन में सुधार हुआ, खेती की लागत नियंत्रित रही और मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर बनी रही।
वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की प्रक्रिया
आदित्य के अनुसार, वर्मी कंपोस्ट निर्माण की शुरुआत गोबर से होती है। गोबर को कुछ समय तक सुरक्षित रखा जाता है ताकि उसमें मौजूद अमोनिया का प्रभाव समाप्त हो जाए। इसके बाद विशेष प्रकार के केंचुए उसमें डाले जाते हैं, जो जैविक पदार्थों को विघटित कर पौधों के लिए उपयोगी खाद में बदल देते हैं।
उन्होंने बताया कि इस कार्य के लिए आवश्यक केंचुए राजस्थान से मंगवाए गए थे। इन केंचुओं की मदद से तैयार होने वाला वर्मी कंपोस्ट पौधों के विकास के लिए उपयोगी पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है। स्थानीय बाजार में इसकी कीमत आम तौर पर 5 से 6 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच रहती है।
खाद के साथ केंचुओं की भी बढ़ी मांग
समय के साथ आदित्य ने अपने व्यवसाय का विस्तार किया। अब वे केवल जैविक खाद ही नहीं बेचते, बल्कि वर्मी कंपोस्ट उत्पादन के लिए उपयोग होने वाले केंचुओं की आपूर्ति भी कर रहे हैं। इससे उनकी आय के दो अलग-अलग स्रोत बन गए हैं।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, वर्मी कंपोस्ट का उपयोग सब्जियों, अनाज और बागवानी फसलों में किया जा सकता है। इससे मिट्टी की संरचना बेहतर होती है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से मिलते हैं। यही कारण है कि किसानों के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
युवाओं के लिए स्वरोजगार का अवसर
जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में वर्मी कंपोस्ट उत्पादन ग्रामीण युवाओं के लिए एक व्यवहारिक स्वरोजगार विकल्प बनकर उभर रहा है। कम निवेश, स्थिर मांग और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई पहलू इस क्षेत्र को आकर्षक बनाते हैं।
आदित्य कुमार का अनुभव यह दर्शाता है कि खेती में पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों को अपनाकर भी आर्थिक सफलता हासिल की जा सकती है। उनकी पहल न केवल किसानों को प्रेरित कर रही है, बल्कि मिट्टी की सेहत और टिकाऊ कृषि की दिशा में भी सकारात्मक संदेश दे रही है।