AGRICULTURE

Litchi – बिहार के वैज्ञानिकों ने विकसित की लगभग बिना बीज वाली नई लीची की किस्म

Litchi – फलों को अधिक स्वादिष्ट और उपभोक्ताओं के लिए सुविधाजनक बनाने की दिशा में बिहार के कृषि वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के शोधकर्ताओं ने ऐसी विशेष लीची विकसित की है, जिसमें बीज बेहद छोटा होता है और फल का अधिकांश हिस्सा गूदे से भरा रहता है। इस नई किस्म को लेकर कृषि क्षेत्र और फल उत्पादकों के बीच काफी उत्साह देखा जा रहा है।

Bihar seedless litchi development

अनुसंधान से मिली नई उपलब्धि

बिहार कृषि विश्वविद्यालय में बागवानी और फल उत्पादन से जुड़े कई शोध कार्य लंबे समय से चल रहे हैं। इसी क्रम में वैज्ञानिकों ने लीची की दो अलग-अलग किस्मों के संयोजन से एक नई प्रजाति विकसित की है। इस विशेष लीची की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बीज लगभग नगण्य आकार का होता है, जिससे खाने योग्य भाग की मात्रा सामान्य लीची की तुलना में अधिक हो जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की किस्म उपभोक्ताओं के साथ-साथ फल कारोबार से जुड़े लोगों के लिए भी लाभदायक साबित हो सकती है।

बिहार की लीची उत्पादन में मजबूत पहचान

देश में लीची उत्पादन के मामले में बिहार लंबे समय से अग्रणी राज्य रहा है। उपलब्ध कृषि आंकड़ों के अनुसार, भारत में उत्पादित कुल लीची का बड़ा हिस्सा बिहार से आता है। राज्य की प्रसिद्ध शाही लीची को पहले ही भौगोलिक संकेतक (GI) का दर्जा मिल चुका है, जिससे इसकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत हुई है।

अब वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि नई विकसित बेदाना लीची भी भविष्य में राज्य की एक नई पहचान बन सकती है।

आकार बड़ा और गूदा अधिक

विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, इस नई लीची का आकार पारंपरिक शाही लीची से बड़ा पाया गया है। फल के भीतर गूदे की मात्रा अधिक है, जबकि बीज बहुत छोटा रहता है। यही कारण है कि इसे उपभोक्ता अनुभव के लिहाज से एक विशेष किस्म माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक गूदा होने से इसकी बाजार मांग बढ़ने की संभावना है, क्योंकि उपभोक्ता आमतौर पर ऐसे फलों को अधिक पसंद करते हैं जिनमें खाने योग्य हिस्सा ज्यादा हो।

जीआई टैग के लिए पहल

विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने बताया कि इस नई लीची की विशेषताओं को देखते हुए इसके लिए जीआई टैग प्राप्त करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। यदि इसे आधिकारिक मान्यता मिलती है, तो यह उत्पाद क्षेत्रीय पहचान और बाजार मूल्य दोनों के लिहाज से लाभ पहुंचा सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है और उत्पाद की ब्रांड वैल्यू भी मजबूत होती है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रजाति में फल उत्पादन की क्षमता भी बेहतर देखी गई है। यदि बड़े स्तर पर इसका विस्तार होता है, तो यह किसानों की आय बढ़ाने में सहायक साबित हो सकती है और बिहार के फल उत्पादन क्षेत्र को नई दिशा दे सकती है।

निर्यात की संभावनाओं पर नजर

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस विशेष किस्म के मूल पौधों की संख्या पहले सीमित थी, लेकिन अब इनके विस्तार पर काम किया जा रहा है। विश्वविद्यालय का फल अनुसंधान विभाग बड़ी संख्या में नए पौधे तैयार कर रहा है ताकि भविष्य में इसका व्यावसायिक उत्पादन बढ़ाया जा सके।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय लीची की पहले से अच्छी मांग है। ऐसे में अधिक गूदे और कम बीज वाली यह नई किस्म निर्यात के क्षेत्र में भी अवसर पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्ता और स्वाद के आधार पर यह विदेशी बाजारों में अपनी अलग पहचान बना सकती है।

किसानों के खेतों में सफल परीक्षण

भागलपुर जिले के नवगछिया क्षेत्र में इस नई लीची का परीक्षण सफल रहा है। कुछ किसानों ने इसके उत्पादन की शुरुआत भी कर दी है। परीक्षण के दौरान पाया गया कि यह किस्म आकार में गोल होती है और इसकी मिठास पारंपरिक किस्मों से अलग अनुभव प्रदान करती है।

Back to top button