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FarmingInnovation success story – बाड़मेर के किसान ने खेजड़ी खेती में दिखाया नया रास्ता और कर दिखाया कमाल

FarmingInnovation success story – राजस्थान के बाड़मेर जिले में भीषण गर्मी और पानी की कमी के बीच एक किसान का अनोखा कृषि प्रयोग अब चर्चा का विषय बन गया है। खडीन क्षेत्र के किसान पन्नाराम चौधरी ने पारंपरिक देशी खेजड़ी के पुराने पेड़ों पर “थार शोभा खेजड़ी” की ग्राफ्टिंग कर ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिससे कम पानी वाले इलाके में भी बेहतर उत्पादन हासिल किया जा रहा है। इस प्रयोग से न केवल सांगरी की पैदावार बढ़ी है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।

Barmer khejri farming innovation model

पुराने पेड़ों को नई तकनीक से मिला नया जीवन

पन्नाराम चौधरी ने बताया कि उन्होंने इस तकनीक को सीखने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र दांता से प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके अलावा उन्होंने इंटरनेट और वीडियो माध्यमों से ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया को विस्तार से समझा। शुरुआत में उन्होंने अपने खेत में मौजूद 15 पुराने खेजड़ी के पेड़ों को इस प्रयोग के लिए चुना।

ग्राफ्टिंग के बाद इन पेड़ों में नई शाखाओं का विकास तेजी से हुआ और कुछ ही समय में उच्च गुणवत्ता वाली सांगरी मिलने लगी। रेगिस्तानी क्षेत्र में जहां सामान्य खेती के लिए पानी सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है, वहां यह प्रयोग किसानों के लिए उम्मीद की नई मिसाल बनकर उभरा है।

दो वर्षों में बढ़ी सांगरी की पैदावार

किसान पन्नाराम के अनुसार, ग्राफ्टिंग के करीब दो साल बाद प्रत्येक पेड़ से 30 से 40 किलो तक सांगरी का उत्पादन मिलने लगा। स्थानीय बाजार में सांगरी की लगातार मांग रहने से उन्हें अच्छी कीमत भी मिल रही है।

उन्होंने बताया कि एक पेड़ से सालाना 5 हजार से 7 हजार रुपये तक अतिरिक्त आय हो रही है। कम लागत और सीमित पानी में तैयार होने वाली यह फसल अब आसपास के किसानों को भी आकर्षित कर रही है। कई किसान इस तकनीक को अपनाने के लिए जानकारी लेने उनके खेत तक पहुंच रहे हैं।

कम पानी वाले इलाकों के लिए उपयोगी मॉडल

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी राजस्थान जैसे सूखे क्षेत्रों में इस तरह के प्रयोग खेती के भविष्य को मजबूत बना सकते हैं। खेजड़ी का पेड़ पहले से ही रेगिस्तानी जलवायु में टिकाऊ माना जाता है, लेकिन ग्राफ्टिंग तकनीक ने इसकी उत्पादकता को और बेहतर बना दिया है।

कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, इस मॉडल से खेती की लागत कम रहती है और लंबे समय तक उत्पादन मिलता है। साथ ही यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार मानी जा रही है क्योंकि इससे हरियाली बढ़ती है और मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है।

कृषि विभाग ने भी की पहल की सराहना

बाड़मेर कृषि विभाग के सहायक निदेशक पदमसिंह भाटी ने इस प्रयोग को किसानों के लिए प्रेरणादायक बताया है। उन्होंने कहा कि पुराने और कम उत्पादन देने वाले खेजड़ी पेड़ों को नई तकनीक से पुनर्जीवित करना एक सकारात्मक कदम है।

उनके अनुसार, ग्राफ्टिंग के जरिए पेड़ों में नई ऊर्जा आती है और उच्च गुणवत्ता वाली सांगरी का उत्पादन संभव होता है। विभाग अब इस मॉडल को अन्य किसानों तक पहुंचाने के प्रयास में जुटा है ताकि अधिक से अधिक लोग कम पानी में लाभकारी खेती कर सकें।

आसपास के किसान भी ले रहे जानकारी

पन्नाराम चौधरी की सफलता के बाद आसपास के गांवों के किसान भी इस तकनीक को समझने में रुचि दिखा रहे हैं। कई किसानों ने अपने खेतों में पुराने खेजड़ी पेड़ों की पहचान कर इसी तरीके से उत्पादन बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है।

स्थानीय स्तर पर यह प्रयोग अब केवल खेती तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण सुधार के उदाहरण के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस मॉडल को बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो सूखे क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

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