AGRICULTURE

Miyazaki Mango – झारखंड के पलामू में शुरू हुई महंगे आम की खेती

Miyazaki Mango – झारखंड के पलामू जिले में अब खेती का एक ऐसा प्रयोग सामने आया है, जिसने स्थानीय स्तर पर ही नहीं बल्कि कृषि जगत में भी दिलचस्पी बढ़ा दी है। यहां पहली बार जापान की चर्चित मियाजाकी किस्म के आम की खेती शुरू हुई है, जिसे दुनिया के सबसे महंगे फलों में गिना जाता है। इस आम को ‘एग ऑफ द सन’ के नाम से भी जाना जाता है, जो इसके चमकदार लाल रंग और खास बनावट की वजह से दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत बेहद ऊंची बताई जाती है, जिससे यह आम एक लग्जरी उत्पाद की श्रेणी में शामिल हो चुका है। ऐसे में पलामू जैसे क्षेत्र में इसकी खेती की शुरुआत होना स्थानीय किसानों के लिए एक नई दिशा की तरह देखा जा रहा है।

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प्रगतिशील किसान ने शुरू किया अनोखा प्रयोग

इस पहल के पीछे पलामू के किसान सतीश दुबे का नाम सामने आया है, जो लंबे समय से अलग-अलग फसलों और पौधों पर प्रयोग करते रहे हैं। उन्होंने बताया कि मियाजाकी आम के बारे में उन्हें इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने इसे उगाने का निर्णय लिया। सतीश पहले से ही अपने खेत में आम की कई किस्मों पर काम कर चुके हैं और अब तक करीब 40 तरह के आम के पेड़ लगा चुके हैं। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की एक नर्सरी से उन्होंने मियाजाकी आम के दो पौधे खरीदे, जिनकी कीमत करीब 15 हजार रुपये थी। यह निवेश उनके लिए एक नए प्रयोग की शुरुआत साबित हुआ।

तीन साल बाद पहली बार दिखाई दिए फल

खरीदे गए दोनों पौधों में से एक पौधा शुरुआती दौर में ही खराब हो गया, लेकिन दूसरा पौधा धीरे-धीरे विकसित होता रहा। करीब तीन साल बाद अब इस पेड़ पर पहली बार फल लगने शुरू हुए हैं। सतीश दुबे के अनुसार, यह उनके लिए एक खास अनुभव है क्योंकि उन्होंने पहली बार अपने ही खेत में इस विदेशी किस्म के आम को फलते देखा है। स्थानीय स्तर पर भी यह एक अनोखी घटना मानी जा रही है, क्योंकि पलामू जिले में संभवतः यह पहला अवसर है जब मियाजाकी आम का उत्पादन हुआ है। आसपास के लोग भी इस पेड़ और इसके फलों को देखने के लिए उत्सुकता के साथ उनके बागान तक पहुंच रहे हैं।

स्थानीय किसानों के लिए खुल सकता है नया रास्ता

इस प्रयोग को केवल एक व्यक्तिगत सफलता के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की संभावनाओं से भी जोड़ा जा रहा है। सतीश दुबे का कहना है कि फिलहाल वे फलों के पूरी तरह पकने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि इसके स्वाद और गुणवत्ता का सही आकलन किया जा सके। यदि यह प्रयोग सफल रहता है और स्थानीय जलवायु इस फसल के अनुकूल साबित होती है, तो आगे चलकर इसका मदर प्लांट तैयार करने की योजना बनाई जा सकती है। इससे अन्य किसानों को भी इस किस्म की खेती का मौका मिल सकता है।

ऐसी स्थिति में पलामू के किसानों के सामने पारंपरिक खेती के साथ-साथ उच्च मूल्य वाली बागवानी का एक नया विकल्प खुलेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर विदेशी और महंगे फलों की खेती यहां सफल होती है, तो यह क्षेत्र न केवल राज्य बल्कि देश के कृषि मानचित्र पर भी अपनी अलग पहचान बना सकता है। इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

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