AGRICULTURE

Poultry Farming – स्वच्छ पालन से देसी मुर्गी बना भरोसेमंद कारोबार मॉडल

Poultry Farming – मिथिला के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से यह धारणा रही है कि देसी मुर्गी ताकत और स्वाद दोनों में बेहतर होती है। हालांकि, खुले में घूमकर कचरा खाने वाली मुर्गियों की तस्वीर ने कई लोगों के मन में संदेह भी पैदा कर दिया था। यही वजह रही कि कुछ परिवार देसी मुर्गी का सेवन करने से बचने लगे। दरभंगा जिले के युवा किसान शशि रंजन ठाकुर ने इस सोच को बदलने की ठानी और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जिसमें देसी मुर्गी की गुणवत्ता के साथ स्वच्छता का भरोसा भी जुड़ा हुआ है। उनके इस प्रयास ने न केवल स्थानीय बाजार में पहचान बनाई, बल्कि आसपास के जिलों तक इसकी मांग पहुंचा दी है।

Clean desi poultry farming model

स्वच्छता के साथ देसी मुर्गी पालन की नई पहल

शशि रंजन ठाकुर का मानना है कि बाजार में मिलने वाले बॉयलर मुर्गे की तुलना में देसी मुर्गी स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर होती है, लेकिन इसके पालन का पारंपरिक तरीका लोगों के भरोसे को कमजोर करता है। इसी समस्या का समाधान खोजते हुए उन्होंने 2023 में सीमित स्तर पर 200 चूजों के साथ अपने फार्म की शुरुआत की। शुरुआत में चुनौतियां जरूर आईं, लेकिन साफ-सुथरे माहौल और नियंत्रित पालन पद्धति ने धीरे-धीरे लोगों का ध्यान खींचा। आज उनके फार्म में 700 से 800 तक मुर्गियां हर समय उपलब्ध रहती हैं और लगातार उत्पादन जारी है।

शेड आधारित पालन प्रणाली से बढ़ा भरोसा

इस फार्म की सबसे खास बात इसकी संरचना है। मुर्गियों को खुले में छोड़ने के बजाय जालीदार शेड में रखा जाता है, जहां साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। फर्श पर सूखी भूसी बिछाई जाती है, जिसे नियमित रूप से बदला जाता है। सप्ताह में दो बार चूने का छिड़काव किया जाता है, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है। पीने के लिए आरओ से साफ किया गया पानी दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया से यह सुनिश्चित किया जाता है कि मुर्गियां किसी भी तरह की गंदगी के संपर्क में न आएं।

प्राकृतिक आहार और बिना दवा के पालन

फार्म में मुर्गियों को दिया जाने वाला आहार भी पूरी तरह प्राकृतिक है। इसमें धान, मक्का, दर्रा, हरी पत्तियां और अजोला शामिल हैं। किसी भी प्रकार के एंटीबायोटिक या ग्रोथ हार्मोन का उपयोग नहीं किया जाता। यही वजह है कि इस फार्म की मुर्गियों को लेकर उपभोक्ताओं का विश्वास लगातार बढ़ रहा है। कई ग्राहक खुद फार्म पर आकर स्थिति देखते हैं और संतुष्ट होकर खरीदारी करते हैं।

स्थानीय बाजार में बढ़ती मांग और बेहतर कीमत

स्वच्छ तरीके से तैयार की गई देसी मुर्गी की कीमत बाजार में सामान्य से अधिक है, फिर भी इसकी मांग कम नहीं हुई है। मुर्गा करीब 400 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है, जबकि अंडा देने के बाद वजन कम हो जाने पर मुर्गी को 220 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बेचा जाता है। देसी अंडों की भी अच्छी मांग है, जो लगभग 10 रुपये प्रति नग के भाव से बिकते हैं। शादी-ब्याह, ठंड के मौसम और सप्ताहांत पर ग्राहकों की भीड़ देखने को मिलती है। कई स्थानीय होटल और ढाबे भी अब फार्म से सीधे मुर्गी खरीदकर ग्राहकों को परोस रहे हैं।

ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का जरिया

दरभंगा के जाले क्षेत्र में स्थित इस फार्म ने रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। करीब 10 स्थानीय युवा यहां काम कर रहे हैं, जिनमें महिलाओं की भी अहम भूमिका है। महिलाएं अंडों की पैकिंग और चूजों की देखभाल जैसे कार्यों में योगदान दे रही हैं। इससे न केवल उनकी आय बढ़ी है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है।

छोटे स्तर से शुरू कर सकते हैं युवा किसान

शशि रंजन ठाकुर का मानना है कि इस तरह का मॉडल छोटे स्तर पर भी आसानी से शुरू किया जा सकता है। कम जमीन वाले किसान 100 से 200 चूजों के साथ शुरुआत कर सकते हैं। जरूरत है तो बस साफ-सफाई बनाए रखने और सही तरीके से प्रबंधन करने की। उनका कहना है कि अगर गुणवत्ता और भरोसा कायम रखा जाए, तो बाजार खुद रास्ता ढूंढ लेता है।

बदलती सोच ने बनाया देसी मुर्गी को ब्रांड

दरभंगा का यह उदाहरण यह दिखाता है कि सही सोच और आधुनिक तरीके अपनाकर पारंपरिक व्यवसाय को भी नई पहचान दी जा सकती है। पहले जहां देसी मुर्गी को लेकर संदेह था, वहीं अब वही उत्पाद एक भरोसेमंद ब्रांड बनकर उभरा है। स्वच्छता और गुणवत्ता के इस मेल ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव की शुरुआत सोच से होती है।

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