SteviaFarming – कम लागत में स्टीविया खेती से किसानों को मिली बढ़ती हुई आय
SteviaFarming – स्वास्थ्य के प्रति लोगों की बढ़ती जागरूकता का असर अब खेती के तरीकों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। झारखंड के पलामू जिले में स्टीविया की खेती किसानों के लिए एक नए विकल्प के रूप में उभर रही है। स्थानीय किसान सतीश दुबे ने इस फसल को अपनाकर न केवल अच्छा उत्पादन हासिल किया है, बल्कि इससे बेहतर आमदनी भी अर्जित की है। उनकी सफलता अब आसपास के किसानों को भी इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर रही है।

छोटे पैमाने पर शुरू हुई खेती से मिला अच्छा परिणाम
सतीश दुबे ने इस बार सीमित क्षेत्र, लगभग एक बीघा जमीन पर स्टीविया की खेती की। इस प्रयोग में उन्हें करीब 30 किलो सूखी पत्तियों का उत्पादन मिला। इन पत्तियों को बाजार में लगभग 1000 रुपये प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है। उनका कहना है कि इस उत्पाद की मांग खासतौर पर उन लोगों के बीच अधिक है, जो स्वास्थ्य को लेकर सजग हैं या जिन्हें शुगर से जुड़ी समस्याएं हैं।
बढ़ती मांग ने खोले नए अवसर
सतीश के अनुसार, स्टीविया एक प्राकृतिक मीठा विकल्प है, जिसे लोग चीनी के विकल्प के रूप में तेजी से अपना रहे हैं। यही वजह है कि बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। उन्हें स्थानीय स्तर पर भी अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने अगले सीजन में इसकी खेती को बड़े स्तर पर करने की योजना बनाई है।
एक बार रोपण, कई वर्षों तक उत्पादन
स्टीविया की खासियत यह है कि इसे एक बार लगाने के बाद कई वर्षों तक लगातार उत्पादन लिया जा सकता है। सामान्यतः यह फसल लगभग पांच साल तक उत्पाद देती है और हर तीन महीने में इसकी कटाई संभव होती है। इससे किसानों को साल में कई बार आय प्राप्त करने का अवसर मिलता है, जो इसे पारंपरिक फसलों से अलग बनाता है।
कम लागत में अधिक लाभ का विकल्प
इस फसल की एक बड़ी विशेषता इसकी कम लागत है। सतीश बताते हैं कि स्टीविया की खेती में शुरुआती निवेश अपेक्षाकृत कम होता है, जबकि लाभ की संभावना अधिक रहती है। यही कारण है कि क्षेत्र के अन्य किसान भी अब इस ओर आकर्षित हो रहे हैं और इसे अपनाने पर विचार कर रहे हैं।
प्रसंस्करण प्रक्रिया भी आसान
कटाई के बाद स्टीविया की पत्तियों को अच्छी तरह सुखाया जाता है और फिर उन्हें पाउडर के रूप में तैयार किया जाता है। यह पाउडर चाय, कॉफी, पेय पदार्थों और बेकिंग में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, शुगर-फ्री उत्पादों और दवाइयों में भी इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है, जिससे इसकी बाजार उपयोगिता और बढ़ जाती है।
सीधी खरीद से बाजार की चिंता कम
सतीश दुबे बताते हैं कि कई कंपनियां सीधे किसानों से स्टीविया खरीदने के लिए संपर्क कर रही हैं। इससे किसानों को अपने उत्पाद के लिए बाजार तलाशने की चिंता कम हो जाती है और उन्हें उचित मूल्य भी मिल जाता है। साथ ही, स्थानीय बाजार में भी इसकी सीधी बिक्री संभव है, जिससे अतिरिक्त लाभ मिल सकता है।
कृषि के नए विकल्प की ओर बढ़ता रुझान
पलामू जैसे क्षेत्रों में स्टीविया की खेती धीरे-धीरे एक भरोसेमंद आय स्रोत के रूप में सामने आ रही है। यदि यह प्रवृत्ति आगे भी जारी रहती है, तो यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगी, बल्कि क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को भी नई दिशा दे सकती है।

