SELF EMPLOYMENT

TaroFarming – बाराबंकी के किसान ने अरबी की खेती से बढ़ाई आमदनी

TaroFarming – उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में एक किसान ने पारंपरिक खेती से अलग रास्ता चुनकर सब्जी उत्पादन के जरिए बेहतर आय का उदाहरण पेश किया है। यहां के बडेल गांव निवासी किसान रामआधार ने अरबी की खेती अपनाकर अच्छी कमाई हासिल की है। आम तौर पर किसान धान और गेहूं जैसी फसलों पर अधिक निर्भर रहते हैं, लेकिन रामआधार ने सब्जियों की खेती में संभावनाएं देखीं और धीरे-धीरे अरबी उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया। उनका कहना है कि कम लागत और स्थिर बाजार मांग के कारण यह फसल किसानों के लिए अच्छा विकल्प बन सकती है। अभी वह लगभग एक से डेढ़ बीघे जमीन पर अरबी उगा रहे हैं और हर सीजन में अच्छी आय प्राप्त कर रहे हैं।

Barabanki farmer taro farming profit

बाजार में लगातार बनी रहती है मांग

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अरबी ऐसी सब्जी है जिसकी मांग साल भर बनी रहती है। कई इलाकों में इसकी खेती कम होने के कारण बाजार में इसकी उपलब्धता सीमित रहती है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना रहती है। रामआधार बताते हैं कि यही कारण है कि उन्होंने इस फसल को अपनाने का निर्णय लिया। स्थानीय मंडियों में अरबी की बिक्री आसानी से हो जाती है और कीमत भी अक्सर संतोषजनक मिलती है। उनका अनुभव है कि यदि किसान सही समय पर बुवाई और देखभाल करें तो यह फसल कम जोखिम में अच्छी आय दे सकती है। यही वजह है कि आसपास के कुछ किसान भी अब इस खेती में रुचि दिखाने लगे हैं।

कम लागत में बेहतर मुनाफा

रामआधार पिछले आठ से दस वर्षों से सब्जियों की खेती कर रहे हैं। उनके मुताबिक सब्जी उत्पादन में मेहनत जरूर अधिक होती है, लेकिन आय भी पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतर मिल सकती है। उन्होंने बताया कि फिलहाल करीब एक बीघे क्षेत्र में अरबी की खेती की जा रही है। इसमें प्रति बीघा लगभग 12 से 15 हजार रुपये तक की लागत आती है, जिसमें बीज, खाद और सिंचाई का खर्च शामिल होता है। अच्छी पैदावार होने पर एक सीजन में 70 से 80 हजार रुपये तक का मुनाफा हो सकता है। उनका कहना है कि बाजार में इसकी स्थायी मांग होने के कारण फसल की बिक्री में ज्यादा परेशानी नहीं आती।

मिट्टी और खेत की तैयारी का महत्व

अरबी की खेती के लिए जमीन का चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। किसान रामआधार के अनुसार बलुई दोमट मिट्टी इस फसल के लिए सबसे उपयुक्त रहती है। साथ ही खेत में पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था होना भी जरूरी है, ताकि जलभराव से पौधों को नुकसान न पहुंचे। खेती शुरू करने से पहले खेत की गहरी जुताई की जाती है और मिट्टी को भुरभुरा बनाकर समतल किया जाता है। इसके बाद निश्चित दूरी पर बीज या कंद लगाए जाते हैं। उचित दूरी रखने से पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और उत्पादन भी बेहतर होता है।

सिंचाई और देखभाल से मिलती है अच्छी पैदावार

रामआधार बताते हैं कि अरबी की खेती अपेक्षाकृत सरल मानी जाती है। बुवाई के करीब दो सप्ताह बाद पौधे निकलने लगते हैं और उसी समय पहली सिंचाई की जाती है। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार खेत में पानी दिया जाता है। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए समय-समय पर खाद भी डाली जाती है। इस फसल की खास बात यह है कि इसमें कीट और रोग की समस्या अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती है, जिससे किसानों को अतिरिक्त खर्च से भी राहत मिलती है। सही देखभाल करने पर पौधे मजबूत होते हैं और उत्पादन भी अच्छा मिलता है।

लगभग छह महीने में तैयार हो जाती है फसल

अरबी की फसल सामान्यतः करीब 180 दिनों में तैयार हो जाती है। जब पौधे पूरी तरह विकसित हो जाते हैं, तब खेत से कंद की खुदाई की जाती है। इसके बाद इन्हें साफ करके स्थानीय मंडियों या बाजारों में बिक्री के लिए भेज दिया जाता है। रामआधार का कहना है कि यदि किसान सही तरीके से खेती करें और बाजार की मांग को समझकर उत्पादन करें तो अरबी जैसी फसल छोटे किसानों के लिए भी आय का अच्छा स्रोत बन सकती है। उनका अनुभव यह भी बताता है कि विविध खेती अपनाने से किसानों को आर्थिक रूप से अधिक स्थिरता मिल सकती है।

Back to top button