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Amla Farming Success story- किसान शिवचरण सैकड़ा ने बागवानी से तैयार की स्थायी आय की राह

Amla Farming Success story- राजस्थान के दौसा जिले के एक किसान शिवचरण सैकड़ा ने पारंपरिक खेती के साथ बागवानी को जोड़कर अपनी आय का एक स्थायी स्रोत तैयार किया है। कई वर्षों पहले उन्होंने अपने खेत में आंवला के पौधे लगाने का निर्णय लिया था। उस समय यह प्रयोग सामान्य खेती से थोड़ा अलग माना जाता था, लेकिन आज वही फैसला उनके लिए आर्थिक रूप से लाभदायक साबित हो रहा है। अब उनके खेत में आंवला के दर्जनों पेड़ हैं और हर साल इनसे अच्छी पैदावार मिलती है, जिससे उन्हें नियमित आय प्राप्त होती है।

Amla farming farmer stable income success story

दो दशक पहले शुरू किया था बागवानी का प्रयोग

शिवचरण सैकड़ा ने लगभग 25 साल पहले अपने खेत में आंवला के पौधे लगाने की शुरुआत की थी। उस समय अधिकांश किसान पारंपरिक फसलों पर ही निर्भर रहते थे, लेकिन उन्होंने खेती के साथ बागवानी को भी अपनाने का फैसला किया।

धीरे-धीरे पौधे बड़े होते गए और कुछ वर्षों के बाद फल देना शुरू कर दिया। आज उनके खेत में करीब 120 आंवला के पेड़ मौजूद हैं। इन पेड़ों से हर साल अच्छी मात्रा में फल प्राप्त होते हैं, जिससे उनकी आय में स्थिरता बनी रहती है।

लंबे समय तक धैर्य और नियमित देखभाल के बाद यह बागवानी उनके लिए एक मजबूत आर्थिक आधार बन चुकी है।

कम लागत में अच्छी पैदावार

आंवला की खेती को कम खर्च में बेहतर उत्पादन देने वाली फसल माना जाता है। शिवचरण सैकड़ा का अनुभव भी इसी बात को साबित करता है। उनके अनुसार इन पेड़ों की देखभाल में बहुत अधिक लागत नहीं आती और एक बार पौधे तैयार हो जाने के बाद हर साल नियमित रूप से फल मिलते रहते हैं।

पौधों की सिंचाई, समय-समय पर छंटाई और सामान्य देखभाल से पेड़ स्वस्थ बने रहते हैं। यही कारण है कि खेती के मुकाबले बागवानी में खर्च अपेक्षाकृत कम रहता है, जबकि उत्पादन लगातार मिलता रहता है।

इस प्रकार आंवला की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का एक भरोसेमंद विकल्प बन सकती है।

व्यापारी सीधे खेत पर करते हैं खरीद

शिवचरण सैकड़ा के खेत में तैयार होने वाले आंवला की मांग स्थानीय बाजार में अच्छी रहती है। फल पकने के मौसम में व्यापारी सीधे उनके खेत पर पहुंचकर फसल का सौदा कर लेते हैं।

कई बार व्यापारी पहले से ही बाग का निरीक्षण कर लेते हैं और अनुमानित उत्पादन के आधार पर अग्रिम भुगतान भी कर देते हैं। इससे किसान को बाजार में फल ले जाने या बिक्री की चिंता नहीं करनी पड़ती।

इस व्यवस्था से समय की बचत होती है और फसल के खराब होने का जोखिम भी कम हो जाता है। किसान को सीधे खेत से ही उचित मूल्य मिल जाता है।

खेती के साथ बागवानी का संतुलन

शिवचरण सैकड़ा केवल आंवला की बागवानी पर निर्भर नहीं हैं। वह पारंपरिक खेती भी करते हैं और दोनों गतिविधियों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाते हैं।

बागवानी से मिलने वाली स्थिर आय उन्हें आर्थिक सुरक्षा देती है, जबकि पारंपरिक खेती से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती रहती हैं। इस तरह उन्होंने खेती का ऐसा मॉडल अपनाया है, जिसमें जोखिम कम और आय के स्रोत अधिक हैं।

कृषि विशेषज्ञ भी किसानों को इसी तरह विविध खेती अपनाने की सलाह देते हैं, ताकि मौसम या बाजार में उतार-चढ़ाव का असर कम पड़े।

अन्य किसानों के लिए बन रही प्रेरणा

शिवचरण सैकड़ा की इस पहल ने आसपास के कई किसानों का ध्यान आकर्षित किया है। क्षेत्र के कुछ किसान अब बागवानी की ओर भी रुख कर रहे हैं और अपने खेतों में फलदार पौधे लगाने के बारे में सोच रहे हैं।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार आंवला जैसे फलदार पेड़ लंबे समय तक उत्पादन देते हैं और पोषण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि इसे खेती के साथ जोड़कर आय बढ़ाने का अच्छा माध्यम माना जाता है।

शिवचरण सैकड़ा की कहानी यह दिखाती है कि धैर्य और सही योजना के साथ खेती में छोटे-छोटे बदलाव भी लंबे समय में बड़ा लाभ दे सकते हैं।

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