Farming Success story – बंजर जमीन को उपजाऊ बनाकर किसान भिखू राम ने लिखी सफलता की कहानी
Farming Success story – छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के करतला विकासखंड के ग्राम बांधापाली में रहने वाले किसान भिखू राम आज आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। कभी पूरी तरह अनुपजाऊ मानी जाने वाली जमीन को उन्होंने अपनी मेहनत, प्रयोग और प्राकृतिक खेती के तरीकों से उपजाऊ बना दिया। एक समय ऐसा था जब उनके खेत में कोई फसल ठीक से नहीं उगती थी, लेकिन आज वही जमीन उन्हें हर साल अच्छी आय दे रही है। स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान अब केवल किसान के रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती के नए प्रयोग करने वाले किसान के तौर पर भी बन गई है।

बंजर जमीन से शुरू हुई संघर्ष की कहानी
भिखू राम के पास जो खेत था, वह लगभग पूरी तरह बंजर माना जाता था। मिट्टी की गुणवत्ता इतनी कमजोर थी कि उसमें खेती की उम्मीद बेहद कम थी। कई बार फसल बोने की कोशिश करने के बावजूद उन्हें संतोषजनक परिणाम नहीं मिले। ऐसे हालात में अधिकांश लोग खेती छोड़ने के बारे में सोच सकते थे, लेकिन भिखू राम ने हार मानने के बजाय जमीन को सुधारने का फैसला किया।
उन्होंने सबसे पहले मिट्टी की स्थिति को समझने की कोशिश की और धीरे-धीरे उसके सुधार पर काम शुरू किया। जमीन की संरचना को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने पारंपरिक गहरी जुताई के बजाय हल्की जुताई की पद्धति अपनाई। इस प्रक्रिया में उन्होंने ड्रम डिगर जैसे उपकरण का उपयोग किया, जिससे मिट्टी की बनावट में सुधार हुआ और जमीन की पानी को रोककर रखने की क्षमता बढ़ी।
जैविक खाद से मिट्टी में लौटी उर्वरता
जमीन की गुणवत्ता सुधारने के लिए भिखू राम ने रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक विकल्पों को अपनाया। उन्होंने किचन वेस्ट से तैयार कंपोस्ट और गोबर की खाद को मिलाकर खेत में उपयोग करना शुरू किया। धीरे-धीरे इन प्राकृतिक तरीकों से मिट्टी में पोषक तत्व वापस आने लगे।
इस प्रक्रिया में समय जरूर लगा, लेकिन लगातार प्रयासों के कारण जमीन की स्थिति पहले से बेहतर होती गई। मिट्टी की उर्वरता बढ़ने के साथ-साथ खेत में फसल उगाने की संभावनाएं भी मजबूत होने लगीं। यही वह दौर था जब भिखू राम ने अपनी खेती की दिशा तय की और सीमित लेकिन उपयुक्त फसलों पर ध्यान देना शुरू किया।
मौसम के अनुसार फसल चयन से बढ़ी आय
मिट्टी में सुधार के बाद भिखू राम ने खेती की ऐसी पद्धति अपनाई, जिसमें मौसम के अनुसार फसल का चयन किया गया। बरसात के मौसम में उन्होंने धान की खेती शुरू की, जबकि गर्मियों के समय में मूंगफली की फसल लगाने का फैसला किया।
इस फसल चक्र से उन्हें अच्छा परिणाम मिलने लगा। धान की खेती से उन्हें स्थिर उत्पादन मिला, जबकि मूंगफली की फसल ने अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार किया। खेती के इन तरीकों ने धीरे-धीरे उनके खेत को उत्पादक बना दिया।
आज स्थिति यह है कि वही जमीन, जिसे पहले बंजर माना जाता था, अब उन्हें सालाना करीब डेढ़ से दो लाख रुपये तक का लाभ दे रही है। यह बदलाव केवल आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि उनके आत्मविश्वास के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
नाबार्ड से मिला प्रशिक्षण और मार्गदर्शन
भिखू राम की इस सफलता के पीछे राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। नाबार्ड के कृषि विकास कार्यक्रम के तहत उन्हें समय-समय पर प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह दी जाती रही।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों में उन्हें प्राकृतिक खेती के विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इसमें बिना रासायनिक उर्वरकों के खेती करने के तरीके, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के उपाय और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के बारे में मार्गदर्शन शामिल था।
इन जानकारियों ने भिखू राम को अपनी खेती को बेहतर बनाने में काफी मदद की और उन्होंने इन्हें अपने खेत में सफलतापूर्वक लागू भी किया।
अन्य किसानों के लिए बना प्रेरणा का उदाहरण
नाबार्ड से जुड़े अधिकारी दिनेश तिवारी के अनुसार, भिखू राम जैसे किसानों की मेहनत और सही मार्गदर्शन मिलकर इस क्षेत्र में टिकाऊ कृषि का एक अच्छा उदाहरण पेश कर रहे हैं। प्राकृतिक खेती न केवल पर्यावरण की रक्षा करती है बल्कि किसानों की आय को भी स्थिर बनाने में मदद करती है।
भिखू राम की सफलता का असर आसपास के गांवों में भी देखने को मिल रहा है। कई अन्य किसान अब बंजर या कम उपजाऊ जमीन को सुधारने के लिए जल संरक्षण और पर्यावरण अनुकूल उपायों को अपनाने लगे हैं।
धान और मूंगफली के मिश्रित फसल पैटर्न को अपनाकर कई किसान अपनी जमीन को उत्पादक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस तरह भिखू राम की कहानी केवल एक किसान की सफलता तक सीमित नहीं रही, बल्कि क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

