Agriculture success story – झारखंड के दो युवाओं ने तरबूज की खेती से बनाई नई पहचान
Agriculture success story – झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादूगोड़ा क्षेत्र से एक प्रेरक कहानी सामने आई है, जहां दो युवाओं ने पारंपरिक खेती को आधुनिक सोच के साथ जोड़कर नई दिशा देने की कोशिश की है। ऐसे समय में जब बड़ी संख्या में युवा गांव छोड़कर शहरों में नौकरी की तलाश में जा रहे हैं, वहीं इस इलाके के दो दोस्तों ने खेती को ही अपने भविष्य का आधार बनाया है। शशिकांत बिश्वासी और मलय गिरी नाम के इन युवकों ने मिलकर लगभग 10 बीघा जमीन पर तरबूज की खेती शुरू की है। उनकी यह पहल अब आसपास के किसानों और युवाओं के बीच चर्चा का विषय बनती जा रही है।

बचपन की दोस्ती से शुरू हुआ खेती का नया प्रयोग
शशिकांत बिश्वासी और मलय गिरी बचपन से ही एक-दूसरे के अच्छे दोस्त रहे हैं और दोनों का परिवार खेती से जुड़ा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने देखा कि यदि खेती को नई तकनीकों और बेहतर योजना के साथ किया जाए तो इससे अच्छी आय अर्जित की जा सकती है। इसी विचार के साथ उन्होंने इस साल बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती करने का निर्णय लिया।
दोनों ने खेत में खास किस्म के तरबूज की खेती शुरू की है, जिसे सिंघम वैरायटी के नाम से जाना जाता है। इस किस्म के तरबूज आकार में बड़े होते हैं और आम तौर पर एक फल का वजन लगभग 5 से 7 किलोग्राम तक पहुंच जाता है। बाजार में इस वैरायटी की मांग भी अच्छी बताई जाती है, इसलिए किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना रहती है।
खेती की तैयारी और देखभाल पर खास ध्यान
खेती शुरू करने से पहले दोनों युवकों ने खेत को पूरी तरह तैयार किया। मिट्टी की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए बीजों का चयन किया गया और उच्च गुणवत्ता वाले बीज लगाए गए। फसल की बेहतर वृद्धि के लिए सिंचाई, खाद और आवश्यक दवाइयों का उपयोग समय-समय पर किया जा रहा है।
दोनों किसान खुद खेत में जाकर फसल की निगरानी करते हैं। कभी सिंचाई करते दिखाई देते हैं तो कभी पौधों की स्थिति का निरीक्षण करते हैं। उनका मानना है कि खेती में नियमित देखभाल सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसी मेहनत का परिणाम है कि इस बार उन्हें अच्छी पैदावार की उम्मीद है।
सीजन में तीन ट्रक उपज की उम्मीद
शशिकांत और मलय का अनुमान है कि इस सीजन में उनकी फसल से लगभग तीन ट्रक तरबूज बाजार तक पहुंच सकते हैं। अगर मौसम अनुकूल रहा और बाजार में मांग बनी रही तो उन्हें अच्छी आय प्राप्त होने की संभावना है। स्थानीय किसानों के अनुसार गर्मी के मौसम में तरबूज की मांग काफी बढ़ जाती है, जिससे फसल को बाजार में आसानी से खरीदार मिल जाते हैं।
तरबूज की खेती आम तौर पर 70 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है। इसी वजह से इसे कम समय में अच्छी आमदनी देने वाली फसल माना जाता है।
लागत और संभावित कमाई
किसानों के मुताबिक तरबूज की खेती में शुरुआती निवेश अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। एक बीघा जमीन पर खेती करने में लगभग 20 से 30 हजार रुपये तक का खर्च आ सकता है। इसमें बीज, खाद, सिंचाई और कीटनाशकों जैसी लागत शामिल होती है।
हालांकि यदि फसल अच्छी तैयार हो जाए और बाजार में उचित दाम मिल जाए, तो एक बीघा जमीन से 60 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये या उससे अधिक की आय संभव बताई जाती है। इसी आधार पर शशिकांत और मलय को उम्मीद है कि पूरे सीजन में उन्हें करीब 10 से 12 लाख रुपये तक का मुनाफा मिल सकता है।
मौसम और रोग से बचाव जरूरी
खेती में कई तरह के जोखिम भी जुड़े रहते हैं। अत्यधिक बारिश, कीटों का प्रकोप या पौधों में बीमारी आने से फसल को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए किसानों को समय-समय पर खेत की निगरानी करना जरूरी होता है।
शशिकांत और मलय का कहना है कि खेती में सफलता के लिए योजना, मेहनत और लगातार देखभाल जरूरी है। उनका मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके अपनाएं और फसल पर नियमित ध्यान दें, तो खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।
दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रहे दोनों युवा
आज इन दोनों दोस्तों की पहल पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन चुकी है। आसपास के कई किसान और युवा उनके खेत पर पहुंचकर खेती की प्रक्रिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर युवा नई सोच और तकनीक के साथ खेती की ओर लौटें, तो गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
शशिकांत और मलय का कहना है कि जो भी किसान तरबूज की खेती के बारे में सीखना चाहता है, वह उनके खेत पर आकर जानकारी ले सकता है। उनका मानना है कि खेती में ज्ञान और अनुभव साझा करने से पूरे क्षेत्र के किसानों को लाभ मिल सकता है।

