Makhana Farming Success- बिहार में मखाना की खेती से तगड़ी कमाई का मार्ग बना चुके हैं किसान नटवर
Makhana Farming Success- बिहार के कई जिलों में मखाना की खेती लंबे समय से तालाबों में की जाती रही है, लेकिन अब इसकी खेती के तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहा है। कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित नई तकनीकों और उन्नत बीजों के कारण किसान अब तालाबों के अलावा खेतों में भी मखाना उगा रहे हैं। इससे किसानों को खेती के नए विकल्प मिल रहे हैं और उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं भी सामने आई हैं। अररिया जिले के कई किसानों ने इस पद्धति को अपनाया है और इसे लाभकारी बताया है।

खेतों में भी संभव हुई मखाना की खेती
राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित नई किस्मों और तकनीकों ने किसानों के लिए खेती का तरीका आसान बना दिया है। पहले जहां मखाना की खेती के लिए बड़े तालाबों की जरूरत पड़ती थी, वहीं अब किसान धान के खेतों में भी इसकी खेती कर पा रहे हैं।
अररिया जिले के किसान नटवर कुमार बताते हैं कि खेतों में मखाना उगाने के लिए मेड़ को ऊंचा बनाकर खेत को छोटे तालाब जैसा तैयार किया जाता है। इसके बाद इसमें लगभग डेढ़ फीट पानी रखा जाता है। इस तरीके से किसान अपनी जमीन का उपयोग करते हुए भी मखाना की खेती कर सकते हैं, जिससे तालाब की जरूरत कम हो जाती है।
फरवरी से शुरू होती है खेती की प्रक्रिया
किसानों के अनुसार मखाना की खेती की शुरुआत नर्सरी तैयार करने से होती है। आमतौर पर फरवरी के महीने में इसकी नर्सरी लगाई जाती है। इसके बाद मार्च और अप्रैल के बीच पौधों की रोपाई की जाती है।
फसल तैयार होने में लगभग आठ महीने का समय लगता है और नवंबर के आसपास इसकी कटाई या निकासी की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान खेत में पानी का संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है, ताकि पौधों का विकास सही तरीके से हो सके।
तालाब और खेत दोनों में हो रही खेती
मखाना की खेती पारंपरिक रूप से तालाबों में की जाती रही है, लेकिन अब कई किसान इसे खेतों में भी उगा रहे हैं। खेती की प्रक्रिया धान की खेती से काफी हद तक मिलती-जुलती है। खेत की जुताई कर उसमें जैविक खाद मिलाई जाती है और फिर पानी भरकर पौधे लगाए जाते हैं।
किसानों का कहना है कि अगर तालाब में पहली बार बीज डाले जाते हैं तो उनका कुछ हिस्सा वहीं रह जाता है और बाद में दोबारा अंकुरित हो सकता है। इस वजह से कई बार अगले मौसम में भी उत्पादन मिल जाता है।
सरकार की योजना से मिल रहा प्रोत्साहन
मखाना उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की ओर से भी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। मखाना विकास योजना के तहत किसानों को प्रति हेक्टेयर लगभग 72,750 रुपये तक की आर्थिक सहायता दी जाती है। यह सहायता अधिकतम तीन वर्षों तक उपलब्ध कराई जाती है।
बिहार के अररिया, मधुबनी, दरभंगा और पूर्णिया जैसे जिलों में मखाना की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अब नई तकनीकों के कारण इन क्षेत्रों के किसान तालाब के साथ-साथ खेतों में भी इस फसल को उगाने लगे हैं।
बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना
मखाना की मांग देश के कई हिस्सों में बनी रहती है। बाजार में इसकी कीमत गुणवत्ता और बाजार के अनुसार बदलती रहती है। हाल के वर्षों में थोक बाजार में इसकी कीमत लगभग 600 रुपये प्रति किलो तक बताई जा रही है, जबकि खुदरा बाजार में यह 1000 से 1500 रुपये प्रति किलो तक बिक सकता है।
कुछ बड़े बाजारों में इसकी कीमत इससे भी अधिक मिल सकती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में मखाना की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना रहती है।
खेती से किसानों को मिल रही अच्छी आय
अररिया जिले के किसान नटवर कुमार लगभग डेढ़ से दो एकड़ भूमि में मखाना की खेती करते हैं। उनके अनुसार प्रति एकड़ इस फसल की खेती में करीब 15 से 25 हजार रुपये तक का खर्च आता है। यदि उत्पादन अच्छा हो और बाजार में उचित मूल्य मिले तो एक एकड़ से लगभग एक लाख रुपये तक की बचत हो सकती है।
किसानों का कहना है कि मखाना की खेती से अच्छी आय प्राप्त हो सकती है, इसलिए क्षेत्र में कई किसान धीरे-धीरे इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं। खेती के साथ-साथ सरकारी योजनाओं और जागरूकता कार्यक्रमों से भी किसानों को नई जानकारी मिल रही है, जिससे इस फसल का विस्तार बढ़ने की उम्मीद है।

