Aquaculture Success Story – उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक किसान ने यह साबित कर दिया कि यदि योजना स्पष्ट हो और इरादे मजबूत हों, तो खेती से जुड़ा काम भी बड़े कारोबार का रूप ले सकता है। राजेश सिंह ने अपने शौक को पेशे में बदलते हुए मछली पालन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। महज डेढ़ लाख रुपये के शुरुआती निवेश से शुरू हुआ उनका सफर आज सालाना 80 से 85 लाख रुपये के टर्नओवर तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी न केवल स्थानीय युवाओं के लिए प्रेरणा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को भी रेखांकित करती है।

पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं, चुना अपना रास्ता
राजेश सिंह ने एमएससी एजी तक पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के बाद उनके सामने नौकरी के कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने परंपरागत रास्ता छोड़कर कुछ अलग करने का निर्णय लिया। उन्हें बचपन से ही मत्स्य पालन में रुचि थी। इसी रुचि को उन्होंने व्यवसाय का रूप देने की ठानी। परिवार के पास उपलब्ध निजी तालाब से उन्होंने काम की शुरुआत की। उस समय कई लोगों ने इसे जोखिम भरा कदम बताया, लेकिन राजेश अपने फैसले को लेकर स्पष्ट थे। उनका मानना था कि अगर वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं तो मत्स्य पालन एक स्थायी और लाभकारी व्यवसाय बन सकता है।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण ने बदली दिशा
शुरुआत में उन्होंने मत्स्य विभाग और आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से प्रशिक्षण लिया। इस प्रशिक्षण ने उनके काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया। पानी की गुणवत्ता, सही प्रजाति का चयन, संतुलित आहार और रोग प्रबंधन जैसी बारीकियों पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया। पारंपरिक पद्धति के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने से उत्पादन में स्थिरता आई और जोखिम कम हुआ। राजेश बताते हैं कि शुरुआती दौर में मिली तकनीकी जानकारी ने उन्हें आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।
छोटे तालाब से 24 हेक्टेयर तक का विस्तार
जिस काम की शुरुआत उन्होंने एक छोटे निजी तालाब से की थी, आज वह लगभग 24 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले तालाबों तक पहुंच चुका है। धीरे-धीरे उन्होंने निवेश बढ़ाया और अब तक करीब पौने दो करोड़ रुपये इस कारोबार में लगा चुके हैं। विस्तार के साथ उन्होंने प्रबंधन प्रणाली भी मजबूत की। मजदूरों की टीम, नियमित निगरानी और बाजार से सीधा संपर्क—इन सबने उनके व्यवसाय को संगठित रूप दिया। उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ उनकी आमदनी भी स्थिर रूप से बढ़ती गई।
विविध प्रजातियों से बढ़ी आमदनी
राजेश सिंह अपने तालाबों में चाइनीज कार्प की प्रजातियां जैसे ग्रास, सिल्वर, बिगहेड और कॉमन कार्प का पालन करते हैं। इसके साथ ही भारतीय कार्प प्रजातियों में रोहू, भाकुर और नैनी भी शामिल हैं। अलग-अलग प्रजातियों के पालन से बाजार में मांग के अनुसार आपूर्ति संभव हो पाती है। इससे जोखिम का बंटवारा भी होता है और आय के स्रोत विविध बने रहते हैं। वह बताते हैं कि मिश्रित प्रजाति पालन से उत्पादन क्षमता बेहतर होती है और तालाब का प्राकृतिक संतुलन भी बना रहता है।
सालाना टर्नओवर ने दिलाई पहचान
आज राजेश सिंह का सालाना टर्नओवर 80 से 85 लाख रुपये के बीच पहुंच चुका है। स्थानीय स्तर पर उन्हें एक सफल मत्स्य उद्यमी के रूप में पहचाना जाता है। कई किसान और युवा उनके फार्म पर आकर जानकारी लेते हैं। राजेश का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र में संसाधनों की कमी नहीं है, जरूरत है सही मार्गदर्शन और धैर्य की। उनका कहना है कि यदि युवा आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक पद्धति के साथ आगे बढ़ें, तो कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में बेहतर भविष्य बनाया जा सकता है।
राजेश सिंह की यह यात्रा दर्शाती है कि खेती और उससे जुड़े व्यवसाय केवल पारंपरिक आय तक सीमित नहीं हैं। सही रणनीति, निरंतर सीखने की इच्छा और बाजार की समझ के साथ यह क्षेत्र भी मजबूत आर्थिक आधार प्रदान कर सकता है।