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Agriculture – सीकर के किसान ने जैविक प्याज से रचा कम लागत का मुनाफा मॉडल

Agriculture – राजस्थान के सीकर जिले की पहचान अब सिर्फ उसकी मिट्टी और जलवायु तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां उगने वाला प्याज भी देशभर में अपनी खास मिठास और गुणवत्ता के लिए जाना जाने लगा है। इसी पहचान को नई ऊंचाई देने का काम चेलासी गांव के किसान महिपाल सिंह ने किया है, जिन्होंने पारंपरिक खेती को समझदारी से आधुनिक तकनीकों से जोड़ते हुए जैविक तरीके से शानदार उत्पादन हासिल किया है।

Sikar organic onion lowcost profit model

योजना और बीज चयन ने बदली खेती की दिशा

महिपाल सिंह ने प्याज की खेती को किस्मत के भरोसे छोड़ने के बजाय पूरी प्लानिंग के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने 26 बीघा जमीन में खेती से पहले मौसम, मिट्टी की स्थिति और बाजार की मांग का आकलन किया। इसके बाद उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन किया गया, जिससे फसल की एकरूपता और उपज दोनों में सुधार देखने को मिला। उनका मानना है कि आधी सफलता सही बीज चुनने में ही तय हो जाती है।

बिना केमिकल के जैविक खेती का सफल प्रयोग

इस पूरी खेती में किसी भी प्रकार के रासायनिक खाद, कीटनाशक या पेस्टीसाइड का इस्तेमाल नहीं किया गया। महिपाल सिंह ने केवल गोबर की खाद और प्राकृतिक तरीकों पर भरोसा रखा। इसके बावजूद उत्पादन में कोई कमी नहीं आई। उनकी फसल न सिर्फ मात्रा में बेहतर रही, बल्कि गुणवत्ता के मामले में भी बाजार में अच्छी पहचान बना पाई।

प्रति बीघा उत्पादन और आमदनी का गणित

इस सीजन में महिपाल सिंह को प्रति बीघा 120 से 125 मण, यानी लगभग 4800 से 5000 किलो प्याज का उत्पादन मिला। बाजार भाव और समय पर बिक्री के चलते प्रति बीघा करीब 70 हजार रुपये की आमदनी हुई। उन्होंने बताया कि एक बीघा में कुल लागत लगभग 15 हजार रुपये आई, जिससे शुद्ध मुनाफा करीब 55 हजार रुपये रहा। यह आंकड़े बताते हैं कि कम लागत में भी खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है।

अगेती खेती से मिले कई फायदे

महिपाल सिंह ने अगेती खेती को अपनी रणनीति का अहम हिस्सा बनाया। समय से पहले फसल तैयार होने के कारण उन्हें बाजार में बेहतर दाम मिले। साथ ही मजदूर आसानी से उपलब्ध हो गए और कटाई में देरी नहीं हुई। अगेती फसल निकलने के बाद खेत अगली फसल के लिए समय पर तैयार हो गए, जिससे पूरे कृषि चक्र में संतुलन बना रहा।

मजदूरी खर्च पर स्मार्ट कंट्रोल

खेती में मजदूरी एक बड़ा खर्च मानी जाती है, लेकिन महिपाल सिंह ने इसका समाधान पहले ही निकाल लिया। उन्होंने मजदूरों की एडवांस बुकिंग कर रेट फिक्स कर ली। इससे न तो कटाई के समय परेशानी हुई और न ही अचानक बढ़ी मजदूरी दरों का असर पड़ा। यह छोटी-सी योजना बड़े स्तर पर लागत नियंत्रण में मददगार साबित हुई।

बीज उत्पादन बना अतिरिक्त आय का जरिया

खेती की सफलता का एक अहम पहलू बीज उत्पादन भी रहा। महिपाल सिंह 10 से 11 बीघा जमीन में प्याज के बीज तैयार करते हैं। इन बीजों की बाजार में कीमत 3000 से 3500 रुपये प्रति किलो तक रहती है। एक बीघा से 70 किलो से लेकर एक क्विंटल तक बीज का उत्पादन हो जाता है, जिससे उनकी आय का एक मजबूत अतिरिक्त स्रोत तैयार हुआ है।

तीन महीने में लाखों की शुद्ध बचत

बीज उत्पादन और प्याज की बिक्री को मिलाकर महिपाल सिंह ने महज तीन महीने की अवधि में लगभग 14 लाख रुपये की शुद्ध बचत का अनुमान जताया है। उनकी यह सफलता दिखाती है कि सही योजना, समय पर निर्णय और संसाधनों के समझदारी भरे उपयोग से खेती को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सकता है।

महिपाल सिंह की कहानी सिर्फ एक किसान की सफलता नहीं है, बल्कि उन किसानों के लिए प्रेरणा है जो कम लागत, जैविक तरीकों और स्मार्ट प्लानिंग के साथ खेती में बेहतर भविष्य तलाश रहे हैं।

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