Arun Mahto’s success story – बोकारो के किसान की नवाचारी खेती से बदली छोटे खेत की तस्वीर
Arun Mahto’s success story: झारखंड के बोकारो जिले के पेटरवार प्रखंड का छोटा सा बंगा गांव इन दिनों एक अलग वजह से चर्चा में है। यहां के किसान अरुण महतो ने पारंपरिक धान–गेहूं के चक्र से बाहर निकलकर बाकला (फावा बींस) की खेती अपनाई और महज 30 डिसमिल जमीन पर ऐसा परिणाम हासिल किया कि आसपास के किसान उनसे सलाह लेने पहुंच रहे हैं। गांव में लोग इसे स्थानीय बोलचाल में “कोलकातिया सब्जी” भी कहते हैं, लेकिन अरुण के लिए यह सिर्फ सब्जी नहीं, बल्कि खेती का एक नया मॉडल बन चुकी है।

उन्होंने बिना किसी बड़े प्रयोगशाला या सरकारी परियोजना के सहारे, अपने अनुभव और समझ से इस फसल को चुना और साबित किया कि सही रणनीति हो तो छोटी जमीन भी बड़ा आर्थिक आधार बन सकती है। उनके खेत में लगे हरे-भरे बाकला के पौधे इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं, जो अब गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा बनते जा रहे हैं।
छोटी जमीन, योजनाबद्ध निवेश
अरुण महतो बताते हैं कि उन्होंने नवंबर में बाकला की बुवाई शुरू की थी, जब इलाके में ठंड धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। इस फसल की खासियत यह है कि इसका शुरुआती उत्पादन करीब 60 से 70 दिनों में मिलने लगता है, जबकि पूरे सीजन में लगभग तीन महीने तक फलियां आती रहती हैं। 30 डिसमिल क्षेत्र में खेती के लिए उन्होंने करीब 15 हजार रुपये का खर्च किया, जिसमें बीज, जैविक खाद, हल्की सिंचाई व्यवस्था और मजदूरी शामिल थी। उन्होंने मिट्टी की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया, खेत की जुताई के बाद गोबर खाद मिलाई और नमी बनाए रखने के लिए उचित अंतराल पर सिंचाई की। अरुण का कहना है कि बाकला की खेती में शुरुआत सही हो जाए तो आगे की देखभाल अपेक्षाकृत आसान हो जाती है, बशर्ते किसान नियमित रूप से अपने खेत पर नजर रखें।
बाजार की मांग और संभावित आय
बाकला को लोग दाल और सब्जी दोनों रूपों में इस्तेमाल करते हैं, इसलिए बाजार में इसकी मांग साल के ठंडे महीनों में खास तौर पर बढ़ जाती है। बोकारो और आसपास के कस्बों में यह सब्जी आसानी से बिक जाती है, क्योंकि यह पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वाद में भी अलग मानी जाती है। अरुण के मुताबिक, एक छोटे से खेत से उन्हें 15 से 20 क्विंटल तक उत्पादन मिलने की उम्मीद है। सर्दियों के दौरान बाजार में इसकी कीमत 60 से 100 रुपये प्रति किलो तक जाती है। अगर न्यूनतम 60 रुपये के भाव से भी बिक्री हो, तो 15 क्विंटल उत्पादन पर करीब 90 हजार रुपये की आमदनी हो सकती है। लागत घटाने के बाद 60 से 70 हजार रुपये का शुद्ध लाभ निकलना संभव है, जो इतनी कम जमीन के लिए बेहद उल्लेखनीय माना जा रहा है। यही वजह है कि गांव के दूसरे किसान भी अब वैकल्पिक फसलों की ओर सोचने लगे हैं।
चुनौतियां और खेती प्रबंधन
हालांकि, बाकला की खेती पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं है। अरुण बताते हैं कि इस फसल में कीटों का प्रकोप और कभी-कभी पौधों के सूखने की समस्या देखने को मिलती है। खासकर अगर सिंचाई समय पर न हो या मिट्टी में नमी की कमी रहे, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। उन्होंने इस चुनौती से निपटने के लिए नियमित निराई-गुड़ाई, जैविक कीटनाशकों का सीमित उपयोग और संतुलित खाद देने की रणनीति अपनाई। उनके अनुसार, किसान अगर शुरुआत से ही फसल की निगरानी करें और मौसम के अनुसार सिंचाई की योजना बनाएं, तो नुकसान की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है। उनका अनुभव यह भी बताता है कि सही देखभाल के साथ बाकला जैसी फसलें छोटे किसानों के लिए सुरक्षित और लाभकारी विकल्प बन सकती हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
अरुण महतो की सफलता ने सिर्फ उनकी आमदनी नहीं बढ़ाई, बल्कि पूरे इलाके में खेती को लेकर सोच भी बदली है। पहले जहां किसान केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहते थे, अब वे बाजार की मांग के अनुसार नई फसलें अपनाने पर विचार कर रहे हैं। स्थानीय कृषि विशेषज्ञ भी इसे सकारात्मक संकेत मानते हैं, क्योंकि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और किसानों की जोखिम क्षमता बढ़ती है। बंगा गांव में कई युवा अब अरुण के खेत पर जाकर तकनीक समझ रहे हैं और अपने परिवार की जमीन पर प्रयोग करने की योजना बना रहे हैं। यह बदलाव बताता है कि सही जानकारी और साहस हो तो छोटे किसान भी खेती में नवाचार कर सकते हैं और अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं।

