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Success Story: डिग्रियां अलमारी में और हाथ में सफलता की चाबी लेकर अमेठी के इस किसान ने लिख दी अपनी तकदीर

Success Story: भारत में आज भी खेती को घाटे का सौदा माना जाता है, लेकिन अगर नीयत साफ हो और नजरिया आधुनिक, तो मिट्टी भी सोना उगल सकती है। अमेठी के एक किसान ने इस पुरानी सोच को अपनी मेहनत से धो डाला है और यह साबित किया है कि (modern farming techniques) का सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति न केवल अपनी किस्मत बदल सकता है, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी बन सकता है।

Success story

एमए की डिग्री और खेतों से लगाव की अनोखी कहानी

सत्येंद्र सिंह (Success Story) कोई साधारण किसान नहीं हैं, बल्कि वे उच्च शिक्षित हैं। अमेठी के गौरीगंज क्षेत्र के टिकरिया गांव के रहने वाले सत्येंद्र ने एमए तक की पढ़ाई की है, लेकिन उन्होंने शहर की भागदौड़ वाली नौकरी के बजाय अपनी जड़ों की ओर लौटना बेहतर समझा। उन्होंने महसूस किया कि (educational qualification in agriculture) का लाभ उठाकर वे पारंपरिक खेती के तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं।

जब एक दोस्त के सुझाव ने बदल दी पूरी जिंदगी

शुरुआत में सत्येंद्र भी बाकी किसानों की तरह धान और गेहूं के पारंपरिक चक्र में फंसे हुए थे, जहाँ मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम था। साल 2016 उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ जब उनके एक मित्र ने उन्हें कुछ अलग करने की सलाह दी। उस सुझाव ने उन्हें (commercial banana cultivation) की तरफ मोड़ा और देखते ही देखते उनकी तकदीर पूरी तरह से बदल गई।

एक एकड़ जमीन और लाखों का शानदार मुनाफा

सत्येंद्र ने रिस्क लिया और पहले साल सिर्फ एक एकड़ जमीन पर केले की फसल लगाई। उनकी मेहनत और लगन का नतीजा यह हुआ कि बिना किसी भारी-भरकम खर्च के उन्हें पहले ही साल लगभग 5 लाख 40 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। इस (return on investment) ने उन्हें यह यकीन दिला दिया कि सही फसल का चुनाव ही किसान की गरीबी का परमानेंट इलाज है।

ऑर्गेनिक खेती की ओर बढ़ता हुआ मजबूत कदम

केले की खेती में मिली पहली सफलता के बाद सत्येंद्र ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वे 3 हेक्टेयर से भी अधिक भूमि पर केले की खेती कर रहे हैं और खास बात यह है कि उन्होंने रसायनों को पूरी तरह त्याग दिया है। वे अब (sustainable organic farming) के जरिए अपनी जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रख रहे हैं और बाजार में उच्च गुणवत्ता वाला फल उपलब्ध करा रहे हैं।

मुर्गी पालन: एक व्यवसाय से दोहरे मुनाफे का गणित

सत्येंद्र सिंह केवल फसल उगाने तक ही सीमित नहीं रहे, उन्होंने अपनी आय के स्रोतों को बढ़ाने के लिए मुर्गी पालन का व्यवसाय भी शुरू किया। आज इस सहायक बिजनेस से उन्हें सालाना 5 से 6 लाख रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। खेती के साथ (poultry farm management) का यह मॉडल एक आत्मनिर्भर किसान की असल पहचान बन चुका है।

लागत में कटौती और खाद का स्मार्ट समाधान

मुर्गी पालन और खेती का तालमेल सत्येंद्र के लिए सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ है। मुर्गियों से मिलने वाले अपशिष्ट का उपयोग वे अपने खेतों में खाद के रूप में करते हैं, जिससे मिट्टी को प्राकृतिक पोषण मिलता है। इस वजह से उन्हें बाजार से (chemical fertilizer savings) करने में मदद मिलती है और उनकी खेती की लागत लगभग शून्य के बराबर हो जाती है।

बिना अनुभव के शुरुआत और विशेषज्ञ बनने का सफर

सत्येंद्र ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि जब उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब उनके पास खेती का कोई विशेष अनुभव नहीं था। लेकिन सीखने की ललक और निरंतर प्रयास ने उन्हें आज एक मंझा हुआ किसान बना दिया है। वह मानते हैं कि (practical agricultural experience) किसी भी किताबी ज्ञान से कहीं ज्यादा कीमती होता है जो वक्त के साथ हासिल किया जाता है।

आत्मनिर्भर भारत की एक जीती-जागती मिसाल

आज सत्येंद्र सिंह अपनी हर जरूरत अपनी खेती और मुर्गी पालन से होने वाली कमाई से पूरी कर रहे हैं। उनका जीवन उन युवाओं के लिए एक कड़ा संदेश है जो नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर आप (entrepreneurship in farming) को अपनाते हैं, तो आपको कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मेहनत और सही मार्गदर्शन की अटूट शक्ति

अंत में सत्येंद्र का यही संदेश है कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती, इसके लिए पसीना बहाना पड़ता है। सही मार्गदर्शन और नवाचार के मेल से खेती को एक प्रीमियम बिजनेस बनाया जा सकता है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि (farmers income growth) केवल कागजी लक्ष्य नहीं है, बल्कि धरातल पर संभव एक सच्चाई है।

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