Organic Farmer success story – इस बिहार के किसान ने खेती से बदली अपनी किस्मत
Organic Farmer success story – बिहार के गया जिले से एक ऐसी प्रेरक कहानी सामने आई है, जिसने खेती को लेकर युवाओं की सोच बदलने की दिशा में नई उम्मीद जगाई है। बोधगया प्रखंड के बगदाहा गांव के रहने वाले श्रीनिवास कुमार ने परंपरागत नौकरी की राह छोड़कर वैज्ञानिक तरीके से खेती को अपनाया और आज लाखों रुपये की सालाना आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी सफलता ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि आसपास के जिलों में भी युवाओं को खेती की ओर आकर्षित किया है।

खेल के मैदान से खेती की जमीन तक का सफर
श्रीनिवास कुमार का शुरुआती सपना एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का एथलीट बनने का था। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी लिया और अपने प्रदर्शन से पहचान बनाई। इसी दौरान उन्हें सरकारी नौकरी के रूप में सिपाही पद का प्रस्ताव भी मिला था। लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
पिता के अचानक निधन के बाद उन्हें अपने गांव लौटना पड़ा। उस समय परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था और घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। ऐसे में उन्होंने एथलेटिक्स छोड़कर खेती को अपनाने का फैसला किया, जो उस समय एक चुनौतीपूर्ण कदम माना जा रहा था।
वैज्ञानिक खेती से बदली आय की तस्वीर
शुरुआत में खेती का ज्यादा अनुभव न होने के बावजूद श्रीनिवास ने हार नहीं मानी। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लिया और आधुनिक तकनीकों को समझकर धीरे-धीरे खेती में बदलाव करना शुरू किया। आज वे लगभग 10 एकड़ जमीन पर नर्सरी, जैविक खेती और वर्मी कंपोस्ट का उत्पादन कर रहे हैं।
इन तरीकों की मदद से उनकी सालाना आय करीब 20 लाख रुपये तक पहुंच गई है। यह बदलाव केवल मेहनत का नतीजा नहीं, बल्कि सही तकनीक और जानकारी के इस्तेमाल का भी उदाहरण है। उनकी खेती पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हुआ है।
वर्मी कंपोस्ट उत्पादन बना आय का मजबूत स्रोत
श्रीनिवास की सफलता का एक बड़ा आधार वर्मी कंपोस्ट उत्पादन है। वे अपने खेत में करीब 50 बेड के माध्यम से हर साल लगभग 2 लाख किलोग्राम जैविक खाद तैयार करते हैं। खास बात यह है कि वे जलकुंभी और केले के तने जैसे संसाधनों का उपयोग कर खाद तैयार करते हैं, जो आमतौर पर बेकार माने जाते हैं।
इस खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश सहित कई आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करते हैं। स्थानीय किसानों और नर्सरी संचालकों के बीच इस खाद की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे उन्हें स्थायी आय का स्रोत मिला है।
प्रशिक्षण और जानकारी ने बदली दिशा
श्रीनिवास का मानना है कि खेती में सफलता केवल मेहनत से नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन से भी मिलती है। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लेकर नई तकनीकों को अपनाया और उन्हें अपने खेत में लागू किया। इससे उन्हें बेहतर उत्पादन और बाजार की समझ विकसित करने में मदद मिली।
वे बताते हैं कि जलकुंभी से तैयार खाद की गुणवत्ता अन्य जैविक खादों की तुलना में बेहतर होती है, जिससे इसकी मांग अधिक रहती है। इसी कारण वे अपने उत्पाद को आसानी से बेच पाते हैं और लगातार मुनाफा कमा रहे हैं।
आज बन चुके हैं जिले के सफल किसानों में शामिल
कुछ साल पहले तक खेती के बारे में सीमित जानकारी रखने वाले श्रीनिवास आज गया जिले के सफल किसानों में गिने जाते हैं। उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की, बल्कि दूसरों के लिए भी एक उदाहरण पेश किया है।
उनकी कहानी यह दिखाती है कि यदि सही दिशा और तकनीक का उपयोग किया जाए तो खेती भी एक लाभकारी व्यवसाय बन सकती है। आज कई युवा उनसे प्रेरणा लेकर खेती को करियर के रूप में अपनाने पर विचार कर रहे हैं।

