Mixed Farming Success- रामपुर के किसान ने दो फसलों से बढ़ाई लगातार आमदनी
Mixed Farming Success- उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में एक किसान अपनी समझदारी भरी खेती की पद्धति के कारण आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। कृपाल सिंह नाम के इस किसान ने पारंपरिक तरीके से हटकर खीरा और करेला की मिश्रित खेती अपनाई है। उनके इस प्रयोग से न केवल उत्पादन बढ़ा है, बल्कि लगभग तीन महीने तक लगातार आय का रास्ता भी खुला है। सीमित जमीन में बेहतर मुनाफा कमाने का यह तरीका अब क्षेत्र में चर्चा का विषय बन चुका है।

अगेती खेती से निरंतर कमाई का रास्ता
कृपाल सिंह ने अपने दो एकड़ खेत में ऐसी योजना बनाई है जिसमें पहले खीरे की फसल तैयार होती है। जब खीरे की पैदावार कम होने लगती है, उसी समय करेला फल देना शुरू कर देता है। इस क्रम से खेत खाली नहीं रहता और बाजार में लगातार सब्जी की आपूर्ति बनी रहती है। किसान बताते हैं कि इस तरह खेती करने से जोखिम भी कम होता है और आमदनी का अंतराल भी नहीं आता। आसपास के कई किसान अब इस मॉडल को समझने उनके खेत पर पहुंच रहे हैं।
आठ वर्षों का अनुभव और बेहतर बीजों का चयन
कृपाल सिंह पिछले आठ से दस वर्षों से इसी पद्धति पर काम कर रहे हैं। वे पौध तैयार करने के लिए अपने खेत में दो छोटे पॉलीहाउस बनाते हैं, जहां लगभग 25 दिनों में स्वस्थ पौधे तैयार हो जाते हैं। इस सीजन में उन्होंने करीब दो किलो करेले और डेढ़ किलो खीरे के बीज का इस्तेमाल किया। खीरे के लिए ‘अनमोल’ किस्म और करेले के लिए ‘यूएस’ व ‘आकाश’ प्रजाति चुनी गई है। इन किस्मों की विशेषता साफ-सुथरा आकार और बेहतर स्वाद है, जिसकी वजह से बाजार में इनकी मांग अधिक रहती है।
खेत की तैयारी में बरती जाती है पूरी सावधानी
बेहतर उत्पादन के लिए खेत की तैयारी को सबसे अहम माना जाता है। कृपाल सिंह पहले गहरी जुताई करवाते हैं, ताकि मिट्टी की परतें खुल सकें। इसके बाद दो से तीन बार रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है। खेत में सड़ी हुई गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट भरपूर मात्रा में डाली जाती है। यदि जमीन भारी हो तो पानी निकास के लिए बालू मिलाई जाती है। इसके बाद समतल बेड बनाए जाते हैं। खीरे की पौध दो से ढाई फीट की दूरी पर और करेले की पौध लगभग तीन फीट की दूरी पर लगाई जाती है। पहले खीरे की रोपाई की जाती है और करीब पंद्रह दिन बाद करेला लगाया जाता है।
मचान विधि से बढ़ी गुणवत्ता और सुरक्षा
कृपाल सिंह अपनी बेल वाली फसलों को जमीन पर फैलाने के बजाय मचान विधि अपनाते हैं। बांस और तार की मदद से बेलों को ऊपर चढ़ाया जाता है। इससे फल जमीन के संपर्क में नहीं आते और सड़न या कीट लगने की संभावना कम हो जाती है। खुले वातावरण में पर्याप्त धूप और हवा मिलने से सब्जियों की गुणवत्ता बेहतर होती है। फल सीधे और चमकदार बनते हैं, जिससे बाजार में उनका भाव अच्छा मिलता है। साथ ही ऊंचाई पर होने से तुड़ाई भी आसान हो जाती है और श्रम की बचत होती है।
उत्पादन और बाजार में बढ़ती मांग
खीरा करीब 45 दिनों में तैयार हो जाता है, जबकि करेला लगभग 60 दिन में फल देने लगता है। एक सीजन में लगभग 15 बार तुड़ाई होती है। किसान के अनुसार, एक बीघा से एक बार में करीब 30 क्विंटल तक उत्पादन मिल सकता है। बाजार में इन सब्जियों का भाव 25 से 30 रुपये प्रति किलो तक मिल रहा है। शुरुआती लागत प्रति बीघा लगभग दो हजार रुपये के आसपास बताई जाती है, जबकि मुनाफा 25 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। रामपुर के स्थानीय बाजारों के साथ-साथ इनकी सब्जियां मुंबई जैसी बड़ी मंडियों तक भेजी जा रही हैं।
किसानों के लिए प्रेरणा बनता मॉडल
कृपाल सिंह का मानना है कि खेती में बदलाव समय की जरूरत है। सीमित संसाधनों में अधिक लाभ पाने के लिए फसल चक्र और मिश्रित खेती जैसे उपाय कारगर साबित हो सकते हैं। उनके खेत का उदाहरण दिखाता है कि सही योजना, गुणवत्तापूर्ण बीज और वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर आम किसान भी बेहतर आय अर्जित कर सकता है। क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञ भी इस प्रयोग को उपयोगी मानते हैं और किसानों को नई तकनीक अपनाने की सलाह देते हैं।

