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MaizeFarming – आपको जोश से भर देगी पूर्वी चंपारण के किसान की सफलता की मिसाल

MaizeFarming – बिहार के पूर्वी चंपारण जिले से एक ऐसे किसान की कहानी सामने आई है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद खेती में अपनी अलग पहचान बनाई है। सुगौली प्रखंड के माधोपुर गांव निवासी गोपाल महतो आज मक्के की खेती से अच्छी आमदनी कर रहे हैं। लगभग दो बीघा जमीन पर की जा रही उनकी खेती ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदली है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का काम किया है।

Maize farming east champaran success

संघर्ष से शुरू हुई यात्रा

गोपाल महतो बताते हैं कि शुरुआत आसान नहीं थी। उनका गांव बुनियादी सुविधाओं के मामले में पिछड़ा है। परिवहन की सुविधा सीमित होने के कारण उन्होंने गन्ने जैसी फसल का विकल्प छोड़ दिया। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने मक्का उगाने का निर्णय लिया। हालांकि जमीन की प्रकृति भी चुनौतीपूर्ण थी। उनके खेत की मिट्टी कठोर और पत्थर जैसी है, जिसे स्थानीय भाषा में बांगर मिट्टी कहा जाता है। ऐसी जमीन में फसल तैयार करना सामान्य मिट्टी की तुलना में अधिक मेहनत मांगता है।

अधिक सिंचाई से मिली सफलता

सामान्य तौर पर मक्के की फसल में तीन से चार बार पानी देना पर्याप्त माना जाता है। लेकिन गोपाल के खेत की मिट्टी पानी जल्दी सोख लेती है और नमी लंबे समय तक नहीं टिकती। इसलिए उन्हें 10 से 11 बार सिंचाई करनी पड़ती है। लगातार निगरानी और समय पर पानी देने की वजह से उनकी फसल बेहतर तैयार होती है। उनका मानना है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, यदि किसान मेहनत और धैर्य बनाए रखे तो परिणाम मिलते हैं।

आमदनी का स्थिर स्रोत

गोपाल महतो के अनुसार, मक्के की खेती से उन्हें हर वर्ष लगभग तीन लाख रुपये तक की आय हो जाती है। स्थानीय व्यापारी सीधे गांव से ही मक्का खरीद लेते हैं। जो बच जाता है, उसे वे मंडी में जमा कर देते हैं और कुछ ही दिनों में भुगतान प्राप्त हो जाता है। इससे उन्हें नकदी प्रवाह में भी दिक्कत नहीं होती। सीमित जमीन होने के बावजूद सही फसल चयन और मेहनत ने उन्हें आर्थिक स्थिरता दी है।

कीट प्रबंधन पर खास ध्यान

मक्का की खेती में कीट लगने का खतरा बना रहता है। गोपाल नए किसानों को सलाह देते हैं कि शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें। जब कीड़े लगना शुरू होते हैं तो पौधों पर अलग-अलग रंग का मल दिखाई देता है। इसे समय रहते पहचानकर उचित दवा का छिड़काव किया जाए तो नुकसान से बचा जा सकता है। उनका कहना है कि फसल की नियमित निगरानी ही सबसे बड़ा बचाव है।

प्रेरणा बन रहे गोपाल

कठिन मिट्टी और सीमित संसाधनों के बावजूद गोपाल महतो ने यह साबित किया है कि सही योजना और मेहनत से खेती लाभदायक बन सकती है। उनकी कहानी क्षेत्र के अन्य किसानों को भी नई संभावनाएं तलाशने के लिए प्रेरित कर रही है। मक्के की फसल ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है और गांव में उनकी पहचान एक सफल किसान के रूप में स्थापित की है।

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