Agriculture Success Story – कोरोना काल में जमुई के किसान ने बदली खेती की तस्वीर
Agriculture Success Story – कोरोना महामारी के दौर में जब शहरों से लेकर गांवों तक अनिश्चितता का माहौल था, तब बिहार के जमुई जिले के एक किसान ने हालात को अवसर में बदलने का साहस दिखाया। झाझा प्रखंड की बाराजोर पंचायत स्थित धपरी गांव के प्रगतिशील किसान पिंटू मंडल ने परंपरागत खेती से अलग राह चुनी और गोभी जैसी नकदी फसल की खेती शुरू की। उस समय जब ज्यादातर लोग रोजगार की कमी और बाजार की बंदी से जूझ रहे थे, उन्होंने जोखिम उठाकर सब्जी उत्पादन का रास्ता अपनाया। आज उनका यही निर्णय गांव की पहचान बन चुका है और कई परिवारों की आय का मजबूत आधार भी।

कोरोना काल में लिया गया जोखिम भरा फैसला
साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान कृषि उपज की बिक्री और परिवहन दोनों चुनौतीपूर्ण थे। ऐसे समय में पिंटू मंडल ने पारंपरिक धान-गेहूं की खेती छोड़कर गोभी उगाने का निर्णय लिया। शुरुआत में गांव के लोगों को यह कदम थोड़ा असामान्य लगा। कई लोगों ने आशंका जताई कि सब्जी की खेती में लागत अधिक है और बाजार अनिश्चित। लेकिन पिंटू ने वैज्ञानिक पद्धति, संतुलित खाद और समय पर सिंचाई का सहारा लिया। उन्होंने स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह भी ली और बीज चयन में सावधानी बरती। मेहनत रंग लाई और पहली ही फसल ने उम्मीद से बेहतर उत्पादन दिया।
दूसरे किसानों के लिए बनी मिसाल
पिंटू मंडल की सफलता ने आसपास के किसानों का नजरिया बदल दिया। जब गांव में ताजी गोभी की पैदावार दिखने लगी और बाजार से अच्छा दाम मिलने लगा, तो अन्य किसानों ने भी रुचि दिखाई। बासुदेव मंडल, पंकज मंडल, गौतम मंडल, नाथू मंडल, त्रिलोकी और सत्यनारायण मंडल जैसे कई किसानों ने धीरे-धीरे नकदी फसल की ओर कदम बढ़ाया। पहले जहां यह प्रयोग एक खेत तक सीमित था, वहीं अब कई परिवार मिलकर सब्जी उत्पादन कर रहे हैं। गांव में खेती को लेकर नई ऊर्जा दिखाई देने लगी है।
बढ़ता रकबा और बेहतर बाजार संपर्क
समय के साथ गोभी की खेती का दायरा बढ़ता गया। आज धपरी गांव में करीब पांच बीघा से अधिक क्षेत्र में गोभी की पैदावार हो रही है। यहां की ताजा सब्जियां झाझा और जमुई बाजार तक नियमित रूप से भेजी जाती हैं। स्थानीय व्यापारियों के साथ सीधा संपर्क बनने से किसानों को उचित मूल्य मिल रहा है। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि घरों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है। कुछ किसानों ने अपनी आमदनी से सिंचाई साधनों और कृषि उपकरणों में भी निवेश किया है।
सरकारी सहायता की कमी की चिंता
हालांकि गांव की यह पहल सराहनीय है, लेकिन किसानों के मन में एक कमी भी महसूस होती है। उनका कहना है कि अब तक किसी सरकारी योजना का सीधा लाभ उन्हें नहीं मिला। न तो बीज पर अनुदान मिला और न ही तकनीकी प्रशिक्षण का नियमित अवसर। किसानों का मानना है कि यदि कृषि विभाग की ओर से मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग मिलता, तो उत्पादन और अधिक बढ़ सकता है। वे चाहते हैं कि छोटे किसानों तक योजनाओं की जानकारी सरल तरीके से पहुंचे।
तकनीकी सहयोग से बन सकता है मॉडल गांव
किसानों का विश्वास है कि यदि सिंचाई सुविधा, उन्नत बीज और भंडारण व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, तो धपरी गांव जिले में सब्जी उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। यहां की जलवायु और मिट्टी पहले ही अनुकूल साबित हो चुकी है। जरूरत है तो केवल संगठित प्रयास और संस्थागत समर्थन की। स्थानीय स्तर पर यदि किसान समूह बनाकर सामूहिक विपणन करें, तो उन्हें और बेहतर लाभ मिल सकता है। आसपास के गांवों के किसान भी अब नकदी फसल की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे क्षेत्र में कृषि का स्वरूप बदलता नजर आ रहा है।
धपरी गांव की यह कहानी बताती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी दूरदर्शिता और मेहनत से नई राह बनाई जा सकती है। एक किसान की पहल ने पूरे गांव को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है। यदि ऐसे प्रयासों को नीति स्तर पर सहयोग मिले, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।

