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Agriculture Success story – गांव में रहकर दो युवकों ने खेती से बनाई नई पहचान

Agriculture Success story – जमशेदपुर के जादूगोड़ा क्षेत्र से एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है, जहां दो युवकों ने पारंपरिक खेती को अपनाकर रोजगार का नया रास्ता चुना है। जब बड़ी संख्या में युवा बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रहे हैं, ऐसे समय में शशिकांत बिश्वासी और मलय गिरी ने गांव में रहकर कृषि को ही अपना पेशा बनाया और सफल भी हो रहे हैं।

Agriculture rural youth farming success

गांव में रहकर खेती को बनाया करियर

शशिकांत और मलय बचपन के दोस्त हैं और दोनों ने मिलकर इस साल करीब 10 बीघा जमीन पर तरबूज की खेती शुरू की। उन्होंने यह फैसला सोच-समझकर लिया और खेती को केवल पारंपरिक काम नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में अपनाया। दोनों का मानना है कि अगर सही तरीके और योजना के साथ खेती की जाए तो यह स्थायी आय का मजबूत स्रोत बन सकती है।

बेहतर तैयारी और तकनीक का उपयोग

खेती शुरू करने से पहले दोनों ने खेत की अच्छी तरह जुताई कर उसे तैयार किया। इसके बाद उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन किया गया ताकि उत्पादन बेहतर हो सके। फसल की देखभाल में भी उन्होंने कोई कमी नहीं छोड़ी। समय-समय पर सिंचाई, उचित मात्रा में खाद और आवश्यक दवाइयों का इस्तेमाल किया जा रहा है। दोनों खुद खेत में मौजूद रहकर हर दिन फसल की निगरानी करते हैं, जिससे किसी भी समस्या का तुरंत समाधान किया जा सके।

कम समय में तैयार होने वाली फसल

तरबूज की खेती को खासतौर पर गर्मियों के मौसम में लाभकारी माना जाता है। यह फसल सामान्यतः 70 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है, जिससे किसानों को जल्दी आय प्राप्त होती है। बाजार में इसकी मांग भी लगातार बनी रहती है, खासकर गर्मियों में इसकी खपत बढ़ जाती है।

लागत और मुनाफे का संतुलन

जानकारी के अनुसार, एक बीघा जमीन पर तरबूज की खेती करने में लगभग 20 से 30 हजार रुपये तक की लागत आती है। यदि फसल अच्छी होती है, तो प्रति बीघा 60 से 80 हजार रुपये तक की आमदनी संभव है। इस हिसाब से यह खेती कम समय में अच्छा लाभ देने वाली साबित हो रही है। शशिकांत और मलय का कहना है कि मेहनत के साथ सही योजना और बाजार की समझ जरूरी है।

स्थानीय युवाओं के लिए बन रहे प्रेरणा स्रोत

इन दोनों युवकों की सफलता ने आसपास के इलाके में एक सकारात्मक संदेश दिया है। अब कई अन्य युवा और किसान भी खेती को एक नए नजरिए से देखने लगे हैं। गांव में रहकर आत्मनिर्भर बनने की यह पहल न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

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