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CattleScheme – गौ वत्स पालन योजना से दुग्ध उत्पादन को मिलेगा बढ़ावा

CattleScheme – जांजगीर-चांपा जिले में पशुपालकों की आय बढ़ाने और दूध उत्पादन को मजबूत करने के उद्देश्य से शासन द्वारा गौ वत्स पालन योजना लागू की गई है। यह योजना विशेष रूप से उन किसानों के लिए तैयार की गई है, जो पशुपालन को अतिरिक्त आय के साधन के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं। पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, कृत्रिम गर्भाधान से जन्मी बछिया के समुचित पालन-पोषण के लिए आर्थिक सहायता और पशु आहार उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि भविष्य में स्वस्थ और अधिक दूध देने वाले पशु तैयार किए जा सकें।

Gaur vats dairy development scheme

कृत्रिम गर्भाधान को प्रोत्साहन देने की पहल

वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस. एल. ओग्रेय ने बताया कि योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में कृत्रिम गर्भाधान को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही देसी नस्ल के पशुओं का संरक्षण और उनकी उत्पादक क्षमता बढ़ाना भी प्राथमिकता में है। जो किसान अपनी गाय या भैंस में कृत्रिम गर्भाधान करवाते हैं और बछिया का जन्म होता है, वे इस योजना के तहत आवेदन कर सकते हैं।

योजना के अंतर्गत चार माह से 24 माह तक की आयु की बछिया के लिए पोषक आहार और चारे की व्यवस्था की जाती है। विभाग का मानना है कि शुरुआती दो वर्षों में यदि बछिया को संतुलित पोषण मिले, तो वह आगे चलकर बेहतर दुधारू पशु बन सकती है। इससे पशुपालकों को स्थायी आय का स्रोत मिलता है।

पोषण पर विशेष ध्यान और अपेक्षित लाभ

अधिकारियों के मुताबिक सरकार लगभग एक वर्ष तक बछिया के लिए आवश्यक पशु आहार उपलब्ध कराती है। उद्देश्य यह है कि पशु का शारीरिक विकास संतुलित तरीके से हो और भविष्य में उसकी दूध देने की क्षमता बेहतर रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि समुचित देखभाल और पोषण मिलने पर ऐसी गाय औसतन 6 से 8 लीटर तक दूध दे सकती है, जो छोटे किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी है।

योजना की कुल इकाई लागत 19,500 रुपये निर्धारित की गई है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसानों से लगभग 1,950 रुपये का अंशदान लिया जाता है, जबकि शेष राशि शासन वहन करता है। इससे सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को कम लागत में योजना का लाभ मिल पाता है।

अंशदान की व्यवस्था और संयुक्त खाता

सामान्य तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के किसानों के लिए 4,875 रुपये का अंशदान तय किया गया है। शेष राशि शासन द्वारा जमा की जाती है। इस योजना की एक खास व्यवस्था यह है कि किसान और शासन के नाम से संयुक्त खाता खोला जाता है। जब खाते में कुल 19,500 रुपये जमा हो जाते हैं, तब उसी राशि से पशु आहार खरीदा जाता है और संबंधित किसान को उपलब्ध कराया जाता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य पारदर्शिता बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि निर्धारित राशि का उपयोग केवल बछिया के पोषण के लिए ही हो। अधिकारियों का कहना है कि इससे पशुपालकों को समय पर गुणवत्तापूर्ण आहार मिल पाता है और योजना का लाभ सीधे तौर पर पशु के विकास में दिखता है।

आय वृद्धि की दिशा में एक कदम

डॉ. ओग्रेय ने बताया कि योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक उद्देश्य पशुपालकों को वैज्ञानिक पद्धति अपनाने के लिए प्रेरित करना भी है। कृत्रिम गर्भाधान के जरिए बेहतर नस्ल तैयार कर दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।

पशुपालन को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए विभाग किसानों से अधिक से अधिक संख्या में योजना का लाभ उठाने की अपील कर रहा है। यदि किसान समय पर आवेदन करें और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करें, तो आने वाले वर्षों में दूध उत्पादन में वृद्धि के साथ उनकी आय में भी स्थिर बढ़ोतरी संभव है।

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