Tomato farming: आधुनिक तकनीक से टमाटर की खेती में मुनाफे की नई कहानी
Tomato farming: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के एक छोटे से गांव मिलाराबाद में रहने वाले युवा किसान अश्विनी कुमार साहू ने यह साबित कर दिया है कि अगर खेती में समझदारी, सही तकनीक और समय पर निर्णय शामिल हों, तो यह केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि एक मजबूत आय का स्रोत बन सकती है। पारंपरिक खेती के तरीकों से आगे बढ़ते हुए उन्होंने टमाटर की खेती को नए नजरिये से अपनाया और आज उसी का परिणाम है कि उनकी पहचान एक प्रगतिशील किसान के रूप में हो रही है। करीब दस वर्षों से खेती कर रहे अश्विनी साहू ने अनुभव से यह सीखा है कि बदलते समय के साथ खेती में भी बदलाव जरूरी है।

पारंपरिक सोच से आगे बढ़ने का फैसला
शुरुआत में अश्विनी कुमार साहू भी सामान्य तरीकों से खेती करते थे, लेकिन उन्हें जल्द ही महसूस हुआ कि केवल पुराने तरीकों पर निर्भर रहने से लागत तो निकल जाती है, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इसी सोच ने उन्हें नई तकनीकों की जानकारी लेने और प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान में वे लगभग एक एकड़ भूमि में टमाटर की खेती कर रहे हैं और यह खेती उनके लिए निरंतर आय का मजबूत जरिया बन चुकी है।
खेती में निरंतर देखरेख का महत्व
अश्विनी साहू मानते हैं कि टमाटर की खेती में सफलता का सबसे बड़ा आधार नियमित निगरानी और फसल की जरूरतों को समझना है। बीज बोने से लेकर फसल की कटाई तक हर चरण पर ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही हो जाए, तो उसका सीधा असर उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है। यही कारण है कि वे रोजाना खेत का निरीक्षण करते हैं और समय पर जरूरी कदम उठाते हैं।
दो महीने बाद बढ़ने लगती है असली चुनौती
टमाटर की फसल जब लगभग दो महीने की हो जाती है, तब पौधों पर फल आने लगते हैं और धीरे-धीरे उनका वजन बढ़ने लगता है। इस अवस्था में पौधों का तना कमजोर पड़ने लगता है और फल के भार से झुक जाता है। अगर इस स्थिति में सही व्यवस्था न की जाए, तो फल जमीन को छूने लगते हैं, जिससे उनके खराब होने की संभावना बढ़ जाती है।
फल सड़ने से होने वाला आर्थिक नुकसान
जब टमाटर जमीन के संपर्क में आते हैं, तो नमी और मिट्टी के कारण उनके सड़ने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इससे न केवल उत्पादन में कमी आती है, बल्कि बाजार में बेचने योग्य फलों की संख्या भी घट जाती है। कई किसानों को इस वजह से भारी नुकसान उठाना पड़ता है और मेहनत के बावजूद उन्हें संतोषजनक आमदनी नहीं मिल पाती।
धागा तकनीक से मिली नई राह
इस समस्या से निपटने के लिए अश्विनी कुमार साहू ने धागा तकनीक को अपनाया। इस विधि में टमाटर के पौधों को मजबूत धागों की सहायता से ऊपर की ओर सहारा दिया जाता है। धागे को पौधे के तने के साथ इस तरह बांधा जाता है कि पौधा सीधा रहे और फल हवा में लटके रहें। इससे न केवल पौधे को सहारा मिलता है, बल्कि फलों का विकास भी बेहतर ढंग से होता है।
गुणवत्ता और उत्पादन में साफ दिखता है फर्क
धागा तकनीक अपनाने के बाद अश्विनी साहू ने अपनी फसल में साफ बदलाव देखा। टमाटर जमीन से दूर रहने के कारण खराब नहीं होते और उनका रंग, आकार तथा चमक बेहतर रहती है। अच्छी गुणवत्ता के कारण बाजार में इन टमाटरों की मांग अधिक रहती है और उन्हें उचित मूल्य भी मिल जाता है। इससे कुल आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
सही समय पर तकनीक अपनाना क्यों जरूरी
अश्विनी कुमार साहू के अनुसार, धागा तकनीक को फसल के 45 से 50 दिन के भीतर अपनाना सबसे उपयुक्त रहता है। इस समय पौधे पर्याप्त मजबूत हो जाते हैं और सहारा मिलने से आगे की पूरी वृद्धि सुरक्षित रहती है। यदि यह काम देर से किया जाए, तो नुकसान की संभावना बनी रहती है।
आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा
अश्विनी साहू की सफलता केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो रही है। उनकी खेती देखकर कई किसान आधुनिक तरीकों के बारे में जानकारी लेने लगे हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि छोटे स्तर पर किए गए सही बदलाव भी खेती को लाभकारी बना सकते हैं।
मेहनत और समझदारी का संतुलन
इस पूरी कहानी से यही सीख मिलती है कि खेती में केवल मेहनत ही काफी नहीं होती, बल्कि सही तकनीक, समय पर निर्णय और निरंतर सीखने की इच्छा भी उतनी ही जरूरी है। अश्विनी कुमार साहू ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक सोच के साथ की गई खेती किसानों के भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बना सकती है।

