Soil pH – गन्ने की पैदावार में मिट्टी संतुलन की अहम भूमिका
Soil pH – शाहजहांपुर से सामने आई जानकारी के अनुसार, गन्ने की अच्छी पैदावार केवल सिंचाई और उर्वरकों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, खासकर उसका pH स्तर, इसमें निर्णायक भूमिका निभाता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मिट्टी का pH संतुलित न हो, तो पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। सही pH स्तर न केवल गन्ने की मात्रा बढ़ाता है, बल्कि उसकी मिठास और वजन को भी बेहतर बनाता है, जो किसानों की आय से सीधे जुड़ा होता है।

संतुलित pH से मिलती है बेहतर बढ़वार
उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार, गन्ने की खेती के लिए 6.5 से 7.5 के बीच का pH स्तर सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस स्थिति में मिट्टी न तो अधिक अम्लीय होती है और न ही अधिक क्षारीय, जिससे पौधे आसानी से पोषक तत्व ग्रहण कर पाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब मिट्टी इस संतुलन में रहती है, तब गन्ने की वृद्धि स्वाभाविक रूप से बेहतर होती है और उत्पादन क्षमता बढ़ती है। इसके विपरीत, असंतुलित pH पौधों की पोषण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
ऊसर और क्षारीय मिट्टी में बढ़ती चुनौती
कई इलाकों में मिट्टी का pH स्तर 8 या उससे अधिक हो जाता है, जिसे क्षारीय या ऊसर भूमि कहा जाता है। ऐसी परिस्थितियों में पारंपरिक गन्ने की किस्में अक्सर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पातीं। वैज्ञानिकों के अनुसार, अधिक pH के कारण मिट्टी में लवणों की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे पौधों की जड़ों को आवश्यक पोषक तत्वों को अवशोषित करने में कठिनाई होती है। इसका परिणाम यह होता है कि फसल का विकास रुक जाता है और उत्पादन घट जाता है।
मिट्टी की जांच से मिल सकता है समाधान
विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि वे समय-समय पर अपनी मिट्टी की जांच कराएं, ताकि pH स्तर की सही जानकारी मिल सके। यदि मिट्टी का संतुलन बिगड़ा हुआ है, तो उचित प्रबंधन के जरिए इसे सुधारा जा सकता है। सही जानकारी के आधार पर उर्वरकों और सुधारक उपायों का चयन करने से फसल की गुणवत्ता को बनाए रखा जा सकता है। इससे न केवल पैदावार बेहतर होती है, बल्कि लागत और जोखिम भी कम होते हैं।
पोषक तत्व अवशोषण पर पड़ता है सीधा असर
मिट्टी का pH स्तर यह तय करता है कि पौधे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे जरूरी पोषक तत्व कितनी मात्रा में ले पाएंगे। जब pH संतुलित होता है, तब ये सभी तत्व आसानी से उपलब्ध रहते हैं। लेकिन pH बढ़ने पर पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो जाती है, जिससे पौधों की ऊंचाई और मोटाई प्रभावित होती है। इसका सीधा असर उत्पादन और किसानों की आमदनी पर पड़ता है।
पत्तियों का विकास भी उतना ही जरूरी
गन्ने की अच्छी पैदावार केवल जड़ों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि पत्तियों के विकास पर भी आधारित होती है। यदि पत्तियां स्वस्थ और घनी होती हैं, तो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बेहतर तरीके से होती है। इससे पौधे अधिक भोजन बना पाते हैं, जो गन्ने में रस और वजन बढ़ाने में मदद करता है। पत्तियों का गहरा हरा रंग इस बात का संकेत होता है कि पौधों को पर्याप्त पोषण मिल रहा है।
ऊसर जमीन के लिए विकसित की गई नई किस्म
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि जिन क्षेत्रों में मिट्टी अधिक क्षारीय है, वहां के लिए विशेष गन्ना किस्में विकसित की गई हैं। इनमें ‘UP 14234’ किस्म का नाम प्रमुख है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देने में सक्षम है। यह किस्म बेहतर जमाव और संतुलित ऊंचाई के लिए जानी जाती है। ऐसे क्षेत्रों के किसानों के लिए यह विकल्प फायदेमंद साबित हो रहा है, जहां पहले गन्ने की खेती करना मुश्किल माना जाता था।

