SaladLeafFarming – रमजान में बढ़ी मांग से किसानों को हुआ गजब का फायदा
SaladLeafFarming – रमजान का महीना शुरू होते ही बहराइच के बाजारों में एक खास हरे पत्ते की मौजूदगी बढ़ जाती है। सब्जी मंडियों और ठेलों पर सजे ये ताजे पत्ते न सिर्फ दिखने में आकर्षक होते हैं, बल्कि रोज़ेदारों की थाली का अहम हिस्सा भी बनते हैं। आम बोलचाल में इन्हें सलाद पत्ता कहा जाता है। कई लोग इसे कच्चा सलाद के रूप में खाते हैं, तो कुछ घरों में इसे बेसन में लपेटकर तलकर परोसा जाता है। स्थानीय डॉक्टर भी इसे सेहत के लिए फायदेमंद बताते हैं। इसी बढ़ती मांग ने बहराइच के किसानों के लिए कमाई का नया रास्ता खोल दिया है।

रमजान में क्यों बढ़ जाती है मांग
स्थानीय किसानों का कहना है कि इस पत्ते की मांग साल भर बनी रहती है, लेकिन रमजान में इसकी खपत अचानक बढ़ जाती है। रोज़ा खोलने के समय हल्के और पौष्टिक भोजन की परंपरा के चलते लोग इसे पसंद करते हैं। कई घरों में इससे कुरकुरी पकौड़ियां बनाई जाती हैं, जो इफ्तार की थाली में खास जगह रखती हैं। स्वाद और सेहत के मेल के कारण व्यापारी भी इस दौरान ज्यादा मात्रा में खरीदारी करते हैं। यही वजह है कि इस सीजन में किसानों को बेहतर दाम मिल जाते हैं।
कई सालों से कर रहे हैं सफल खेती
बहराइच के किसान हाजी चौधरी बागवान लंबे समय से सलाद पत्ते की खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह फसल कम समय में तैयार हो जाती है और ज्यादा देखभाल भी नहीं मांगती। सही मौसम और नियमित सिंचाई के साथ इसकी पैदावार संतोषजनक रहती है। उन्होंने बताया कि रमजान के आसपास बिक्री तेज होने से उनकी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इसी तरह जिले के अन्य किसान भी अब इस फसल की ओर रुख कर रहे हैं।
बीज तैयार करने का तरीका
सलाद पत्ते की खेती करने वाले किसान कलीम मोहम्मद बताते हैं कि इसके बीज बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इसलिए किसान खुद ही बीज तैयार करते हैं। फसल के दौरान कुछ पौधों को पूरी तरह बढ़ने दिया जाता है। जब उनमें फूल और बीज बनने लगते हैं, तो उन्हें सुखाकर बीज अलग कर लिए जाते हैं। अगले सीजन में यही बीज काम आते हैं। इस तरह किसान बाहरी निर्भरता से बच जाते हैं और लागत भी कम रहती है।
लागत और संभावित मुनाफा
कलीम मोहम्मद के अनुसार, यदि कोई किसान एक बीघा में इसकी खेती करता है तो शुरुआती खर्च लगभग तीन से चार हजार रुपये के बीच आता है। वहीं अच्छी पैदावार होने पर 20 से 25 हजार रुपये तक का लाभ मिल सकता है। बाजार में मांग के अनुसार इसका भाव दो सौ से ढाई सौ रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाता है। एक पौधे से दो बड़े पत्ते मिलते हैं, जिनका वजन 200 से 250 ग्राम तक हो सकता है। यही वजह है कि सीमित जमीन में भी अच्छी कमाई संभव है।
खेती की प्रक्रिया और देखभाल
इस फसल के लिए पहले नर्सरी तैयार की जाती है। बीजों को क्यारियों में बोया जाता है और पौधे तैयार होने पर उन्हें मेड पर रोप दिया जाता है। मेड पर रोपाई करने से जल निकास बेहतर रहता है और पौधों की वृद्धि तेज होती है। नियमित सिंचाई जरूरी है, लेकिन पानी जमा न हो इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है। किसान चाहें तो जैविक खाद का उपयोग कर भी अच्छी पैदावार ले सकते हैं। रोग और कीट का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है, जिससे अतिरिक्त खर्च नहीं बढ़ता।
स्थानीय बाजार में मजबूत पकड़
बहराइच और आसपास के क्षेत्रों में इस पत्ते की अच्छी खपत है। व्यापारी सीधे खेत से खरीदारी कर लेते हैं, जिससे किसानों को परिवहन का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ता। रमजान के समय बिक्री और तेज हो जाती है। किसानों का मानना है कि यदि उचित मार्गदर्शन और बाजार की जानकारी मिलती रहे तो यह फसल छोटे और मध्यम किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बन सकती है।

