AGRICULTURE

Potato Cultivation: आलू की फसल को रोगों से बचाकर बेहतर पैदावार पाने के प्रभावी उपाय

Potato Cultivation: अगर आपने इस मौसम में अपने खेत में आलू की खेती की है, तो यह समय सबसे अधिक सावधानी बरतने का होता है। आलू की फसल शुरुआत में जितनी हरी-भरी और स्वस्थ दिखती है, उतनी ही जल्दी वह बीमारियों की चपेट में भी आ सकती है। थोड़ी सी लापरवाही पूरे सीजन की मेहनत पर पानी फेर सकती है। आलू किसानों के लिए नकदी फसल मानी जाती है और इससे मिलने वाली आय परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करती है। लेकिन कुछ गंभीर रोग ऐसे हैं, जो समय पर नियंत्रण न किए जाएं तो पैदावार और गुणवत्ता दोनों को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं।

Potato cultivation

अक्सर किसान शुरुआती लक्षणों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही बाद में भारी नुकसान का कारण बनती है। झुलसा रोग, स्कर्फ रोग और विषाणु जनित रोग आलू की खेती में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली समस्याएं हैं। इन रोगों की समय रहते पहचान और सही प्रबंधन से ही अच्छी उपज और बेहतर दाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

फसल की नियमित निगरानी क्यों है जरूरी

आलू की खेती में नियमित निगरानी सबसे अहम कदम है। खेत में रोजाना घूमकर पौधों की पत्तियों, तनों और मिट्टी की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। मौसम में नमी बढ़ते ही रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। यदि शुरुआती अवस्था में ही लक्षण पहचान लिए जाएं, तो कम खर्च में ही रोग पर काबू पाया जा सकता है। वैज्ञानिक तरीके अपनाकर किसान न सिर्फ नुकसान से बच सकते हैं, बल्कि फसल की गुणवत्ता भी बेहतर बना सकते हैं।

झुलसा रोग: आलू की खेती का सबसे बड़ा दुश्मन

झुलसा रोग को आलू की खेती का सबसे खतरनाक रोग माना जाता है। यह दो प्रकार का होता है – अगेती झुलसा और पछेती झुलसा। इसकी शुरुआत पत्तियों पर छोटे भूरे या काले रंग के धब्बों से होती है। धीरे-धीरे ये धब्बे फैलकर पूरी पत्ती को जला देते हैं। अधिक नमी की स्थिति में पत्तियों के निचले हिस्से पर सफेद रुई जैसी फफूंद दिखाई देने लगती है।

समय पर नियंत्रण न किया जाए तो यह रोग तनों तक पहुंच जाता है और कंदों पर भी असर डालता है। इससे कंद छोटे रह जाते हैं और कई बार सड़ने भी लगते हैं, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है।

झुलसा रोग से बचाव के उपाय

झुलसा रोग से बचने के लिए सबसे पहले रोगमुक्त और प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें। खेत में पानी का जमाव न होने दें, क्योंकि अधिक नमी रोग को बढ़ावा देती है। आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने से बचें। रोग के लक्षण दिखते ही नियमित अंतराल पर अनुशंसित दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। पछेती झुलसा की स्थिति में समय पर फफूंदनाशक का प्रयोग फसल को बचाने में काफी कारगर होता है।

स्कर्फ रोग से घटती है आलू की गुणवत्ता

स्कर्फ रोग एक फफूंद जनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से आलू के कंदों को प्रभावित करती है। यह रोग दो प्रकार का होता है – ब्लैक स्कर्फ और सिल्वर स्कर्फ। इस रोग में आलू की सतह पर काले या चांदी जैसे धब्बे बन जाते हैं। देखने में भले ही कंद खाने योग्य रहते हैं, लेकिन बाजार में उनकी कीमत काफी कम मिलती है।

यह रोग मिट्टी और संक्रमित बीज कंदों के माध्यम से फैलता है। यदि खेत की तैयारी सही न हो और बीज उपचार न किया जाए, तो स्कर्फ रोग तेजी से फैल सकता है।

स्कर्फ रोग से बचाव के तरीके

स्कर्फ रोग से बचाव के लिए खेत की गहरी जुताई करना बेहद जरूरी है, ताकि मिट्टी में मौजूद रोगाणु नष्ट हो सकें। रोग-रोधी किस्मों का चयन करना भी फायदेमंद रहता है। बुवाई से पहले बीज कंदों को फफूंदनाशक घोल से उपचारित करने से रोग का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

विषाणु रोग से रुक जाता है पौधों का विकास

विषाणु जनित रोग आलू की फसल में धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन इनका असर काफी गंभीर होता है। इस रोग में पौधों की पत्तियां छोटी रह जाती हैं, मुड़ जाती हैं और उनका रंग पीला पड़ने लगता है। पौधे का विकास रुक जाता है और कंदों का आकार छोटा रह जाता है।

यह रोग मुख्य रूप से रस चूसने वाले कीटों के माध्यम से फैलता है। एक बार खेत में यह रोग फैल जाए, तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है।

विषाणु रोग से बचाव के उपाय

विषाणु रोग से बचने के लिए हमेशा प्रमाणित और स्वस्थ बीज का ही उपयोग करें। रस चूसने वाले कीटों पर नियंत्रण रखना बेहद जरूरी है। संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से निकालकर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि रोग अन्य पौधों तक न फैले।

पोटाश से बढ़ेगा कंद का आकार और गुणवत्ता

आलू की फसल में पोषक तत्वों की सही मात्रा बहुत जरूरी होती है। इनमें पोटाश का विशेष महत्व है। पोटाश देने से कंदों का आकार बढ़ता है, वे मजबूत बनते हैं और उनकी गुणवत्ता में सुधार होता है। फसल के दौरान कम से कम दो बार पोटाश का प्रयोग करना लाभदायक माना जाता है।

निर्धारित मात्रा में पोटाश को पानी में घोलकर छिड़काव करने से कंदों का विकास बेहतर होता है और बाजार में आलू अच्छे दाम पर बिकते हैं।

Back to top button