AGRICULTURE

PapayaFarming – सारण में किसान ने रेड लेडी पपीते की खेती से बढ़ाई आमदनी

PapayaFarming – बिहार के कई किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ बागवानी आधारित फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। कम समय में बेहतर उत्पादन और बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना के कारण फल उत्पादन किसानों के लिए एक नया विकल्प बनता जा रहा है। सारण जिले के तरैया प्रखंड के माधोपुर गांव के किसान राजीव प्रसाद ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाया और रेड लेडी किस्म के पपीते की खेती शुरू की। उनकी मेहनत और प्रयोगात्मक सोच का परिणाम यह हुआ कि आज उनके खेत में लगे पपीते के पौधे भरपूर फल दे रहे हैं। इस खेती से उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी है, जिससे आसपास के किसानों के बीच भी इस फसल को लेकर उत्सुकता बढ़ी है।

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प्रशिक्षण और सरकारी सहायता से मिली नई दिशा

राजीव प्रसाद बताते हैं कि उन्होंने इस फसल की शुरुआत करने से पहले कृषि वैज्ञानिकों से जानकारी ली और प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। खेती के आधुनिक तरीकों को समझने के बाद उन्होंने रेड लेडी किस्म के पपीते के पौधे लगाए। उद्यान विभाग की योजना के तहत उन्हें पौधों पर लगभग 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी भी मिली, जिससे शुरुआती लागत कम हो गई। उनके अनुसार यदि किसान सही जानकारी और मार्गदर्शन के साथ खेती करें तो बागवानी की फसलें बेहतर आय का जरिया बन सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने खेत में इस नई किस्म को अपनाया।

कम समय में शुरू हो जाता है फलन

इस किस्म के पपीते की खासियत यह है कि पौधे लगाने के कुछ ही महीनों बाद फल आने लगते हैं। किसान राजीव प्रसाद बताते हैं कि पौधारोपण के लगभग तीन महीने बाद ही पौधों पर फल दिखाई देने लगते हैं। यही कारण है कि यह फसल किसानों के लिए आकर्षक मानी जाती है। कम समय में उत्पादन मिलने से किसानों को जल्दी आय प्राप्त होने लगती है। खेत में लगाए गए पौधों पर इस समय बड़ी संख्या में पपीते लगे हुए हैं, जिससे उत्पादन की संभावना भी काफी बेहतर दिखाई दे रही है।

एक पौधे से मिल सकता है अच्छा उत्पादन

राजीव के अनुसार इस खेती में प्रति पौधा लागत काफी कम आती है। एक पौधे पर लगभग 35 से 40 रुपये तक का खर्च होता है। अच्छी देखभाल और उचित पोषण मिलने पर एक पौधे से लगभग 80 किलो से लेकर डेढ़ क्विंटल तक पपीता प्राप्त हो सकता है। बाजार में मांग और कीमत के अनुसार एक पौधे से लगभग 2500 रुपये से लेकर 8000 रुपये तक की आमदनी संभव हो जाती है। इस तरह अगर किसान बड़ी संख्या में पौधे लगाते हैं तो कुल आय भी काफी बढ़ सकती है।

जैविक तरीके से उगाए गए फल की बढ़ी मांग

राजीव प्रसाद अपने खेत में पपीते की खेती मुख्य रूप से जैविक पद्धति से कर रहे हैं। उनका कहना है कि रासायनिक तत्वों का कम उपयोग करने से फल की गुणवत्ता बेहतर रहती है। बाजार में भी ऐसे फलों की मांग बढ़ रही है जो प्राकृतिक तरीके से उगाए गए हों। स्थानीय बाजार में उनके पपीते को अच्छी कीमत मिल रही है क्योंकि उपभोक्ता सुरक्षित और ताजे फल खरीदना पसंद कर रहे हैं। यह भी एक कारण है कि उनकी खेती लाभदायक साबित हो रही है।

स्थानीय स्तर पर किसानों के लिए नया विकल्प

सारण जिले के कई किसानों के लिए यह खेती अब एक नए अवसर के रूप में देखी जा रही है। पारंपरिक फसलों के मुकाबले पपीते की खेती कम समय में उत्पादन देती है और बाजार में इसकी मांग भी बनी रहती है। राजीव प्रसाद का अनुभव बताता है कि यदि किसान नई तकनीकों और उन्नत किस्मों को अपनाएं तो खेती से अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है। उनकी सफलता ने आसपास के कई किसानों को भी इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया है।

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