AGRICULTURE

MoongFarming – विंध्य में खाली खेतों से अतिरिक्त आय की राह

MoongFarming – मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र की मिट्टी और मौसम दलहनी फसलों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में किसान रबी की फसल कटने के बाद खेतों को कुछ महीनों के लिए खाली छोड़ देते हैं। सरसों, आलू और मसूर की कटाई के बाद जून में धान की रोपाई तक का समय अक्सर बिना उपयोग के गुजर जाता है। कृषि विभाग अब किसानों को इस अंतराल का बेहतर इस्तेमाल करने की सलाह दे रहा है। विभाग का मानना है कि यदि इस अवधि में मूंग की खेती की जाए तो न केवल अतिरिक्त आमदनी हो सकती है, बल्कि खेत की उर्वरता भी सुधरती है।

Vindhya moong farming extra income

कम समय में तैयार होने वाली फसल

कृषि अधिकारियों के अनुसार मूंग की फसल 60 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। यदि मार्च में इसकी बुवाई कर दी जाए तो जून तक कटाई संभव है और धान रोपाई से पहले खेत फिर से तैयार हो जाता है। इस तरह फसल चक्र भी संतुलित रहता है। कृषि अधिकारी संजय सिंह बताते हैं कि मूंग की खेती से किसानों को कम अवधि में बेहतर लाभ मिल सकता है। इससे खेत खाली नहीं रहते और साल भर उत्पादन बना रहता है।

मिट्टी की सेहत पर सकारात्मक असर

विशेषज्ञों का कहना है कि मूंग केवल आर्थिक लाभ ही नहीं देती, बल्कि भूमि की गुणवत्ता भी सुधारती है। फली तोड़ने के बाद बचा हुआ हरा हिस्सा यदि खेत में मिला दिया जाए तो वह हरी खाद का काम करता है। इससे मिट्टी में कार्बनिक तत्व बढ़ते हैं और अगली फसल, खासकर धान की पैदावार में सुधार होता है। दलहनी फसल होने के कारण यह जमीन में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में भी मददगार मानी जाती है। इस तरह मूंग खेती और मिट्टी दोनों के लिए लाभकारी विकल्प बन सकती है।

बुवाई का सही समय और उपयुक्त मिट्टी

कृषि विशेषज्ञ राजेश पटेल के मुताबिक 10 मार्च से 15 अप्रैल के बीच का समय मूंग की बुवाई के लिए अनुकूल है। अच्छी जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी में इसका उत्पादन बेहतर होता है। हालांकि विंध्य क्षेत्र की लाल और काली मिट्टी में भी संतोषजनक परिणाम मिल सकते हैं। बुवाई से पहले खेत की गहरी जुताई जरूरी है। पलटा हल से जुताई करने के बाद डिस्क और कल्टीवेटर से मिट्टी को भुरभुरा बनाना चाहिए। बुवाई के समय खेत में नमी का संतुलन बना रहना जरूरी है, ताकि अंकुरण ठीक से हो सके।

उन्नत किस्मों से बेहतर पैदावार

कृषि विभाग द्वारा सुझाई गई कई उन्नत किस्में कम समय में अच्छी उपज देती हैं। इनमें पूसा 1431, पूसा 9531, पूसा रत्ना, पूसा 672, पूसा विशाल, वसुधा, सूर्या, विराट, सम्राट और आईएमजी 62 जैसी किस्में शामिल हैं। ये प्रजातियां सामान्यतः 60 से 70 दिनों में तैयार हो जाती हैं और उत्पादन क्षमता भी संतोषजनक रहती है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किस्म का चयन करने से जोखिम कम होता है और परिणाम बेहतर मिलते हैं।

बुवाई की विधि और पोषण प्रबंधन

एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 20 से 25 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता है। सीड ड्रिल से बुवाई करने पर बीज समान दूरी पर गिरते हैं और पौधों की वृद्धि संतुलित रहती है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 4 से 5 सेंटीमीटर का अंतर रखने की सलाह दी जाती है। संतुलित उर्वरक का प्रयोग भी आवश्यक है। प्रति हेक्टेयर 10 से 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 45 से 50 किलोग्राम फास्फोरस, 50 किलोग्राम पोटाश और 20 से 25 किलोग्राम सल्फर देने से अच्छी पैदावार मिल सकती है।

विंध्य क्षेत्र में यदि किसान इस खाली अवधि का उपयोग मूंग की खेती के लिए करें तो आय के साथ-साथ मिट्टी की सेहत भी बेहतर हो सकती है। कृषि विभाग का मानना है कि यह फसल चक्र को मजबूत करने और उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।

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