AGRICULTURE

Millet Cultivation: बाजरे की खेती में करें ये काम, मिलेगा दोगुना मुनाफा

Millet Cultivation: खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही बाजरा बोने का समय भी आ गया है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बाजरा एक मुख्य फसल होने के अलावा, इसे एक ऐसी फसल भी माना जाता है जो कम लागत में अच्छी पैदावार देती है और सूखे को भी झेल सकती है। अगर किसान कुछ मुख्य बातों को ध्यान में रखें तो वे अपना उत्पादन और लाभ (Production and Profit) चार गुना बढ़ा सकते हैं।

Millet cultivation

बाजरा बोने के लिए साल का सबसे अच्छा समय जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के मध्य के बीच माना जाता है। फसल की गुणवत्ता बढ़ाने के अलावा, समय पर बीज बोने से कीटों और बीमारियों (Pests and Diseases) से होने वाले नुकसान कम होते हैं।

जहाँ तक संभव हो प्रमाणित, रोग-मुक्त और अत्यधिक उत्पादक बीजों (Disease Free and High Yielding Seeds) का उपयोग करें। कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने वाली प्रमुख किस्में “राज-171”, “एचएचबी-67”, “आईसीटीपी-8203” और अन्य हैं।

खाद और उर्वरक के उचित प्रबंधन से बढ़ेगा उत्पादन

बाजरे की फसल (Millet Crop) की पोषण संबंधी ज़रूरतें अलग होती हैं। खेत तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर 8-10 टन गोबर की खाद डालना फ़ायदेमंद होता है। इसके अलावा, प्रत्येक एकड़ में 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फॉस्फेट और 20 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है।

इस मात्रा का आधा हिस्सा बुवाई के समय इस्तेमाल किया जाना चाहिए, और बाकी आधा हिस्सा 25-30 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग (Top Dressing) के रूप में लगाया जाना चाहिए। अनाज की उपज और गुणवत्ता सीधे उर्वरक संतुलन से प्रभावित होती है।

पानी देने और खरपतवार नियंत्रण पर दें ध्यान

पहली सिंचाई रोपण (Irrigation Planting) के तुरंत बाद और दूसरी सिंचाई फूल आने से पहले की जानी चाहिए। बाजरा एक ऐसी फसल है जो कम पानी में भी अच्छी उपज देती है। इसके अलावा, बुवाई के 15 से 20 दिन बाद खरपतवार प्रबंधन महत्वपूर्ण है। यदि आवश्यक हो, तो इसके लिए उचित शाकनाशी का प्रयोग करें और साथ ही निराई भी करें।

फसल प्रबंधन से लाभ में होगी वृद्धि

यदि किसान बीज चयन, उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई (Seed selection, fertilizer management, weed control and irrigation) में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करते हैं, तो बाजरे की पैदावार में 25-40% की वृद्धि हो सकती है। उत्पादन बढ़ाने के अलावा, इससे बाजार मूल्य में सुधार होगा, जिससे लाभ दोगुना हो सकता है।

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