MarigoldFarming – फरवरी में गेंदा खेती से बढ़ेगी किसानों की आमदनी
MarigoldFarming – फरवरी का महीना बिहार के किसानों के लिए नई संभावनाएं लेकर आता है। खासकर समस्तीपुर और आसपास के इलाकों में इस समय मौसम फूलों की खेती के लिए अनुकूल रहता है। तापमान संतुलित होने के कारण पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और रोगों का खतरा भी कम रहता है। ऐसे में गेंदा की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है। सालभर इसकी मांग बनी रहती है—चाहे शादी-ब्याह हो, धार्मिक आयोजन हों या घरों और संस्थानों की सजावट। यही वजह है कि अब कई किसान पारंपरिक फसलों से हटकर फूलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं।

पूसा की उन्नत किस्में दे रही बेहतर परिणाम
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा की युवा वैज्ञानिक डॉ. पार्वती के अनुसार, समस्तीपुर क्षेत्र की जलवायु गेंदा उत्पादन के लिए उपयुक्त है। विश्वविद्यालय द्वारा विकसित ‘पूसा नारंगी’ और ‘पूसा बसंती’ जैसी उन्नत किस्में यहां अच्छा उत्पादन देती हैं। इन किस्मों के फूलों का रंग आकर्षक होता है, आकार समान रहता है और ताजगी भी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे बाजार में इनकी मांग अधिक रहती है।
इसके अलावा किसान कोलकाता गेंदा और टेनिस बॉल जैसी लोकप्रिय किस्मों का भी चयन कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सही किस्म का चुनाव खेती की सफलता की दिशा तय करता है। यदि किसान स्थानीय जलवायु और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर किस्म चुनते हैं, तो उन्हें बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
नर्सरी में पौध तैयार करना है जरूरी
वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि गेंदा की खेती सीधे खेत में बीज डालकर करने की बजाय पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाए। नर्सरी में लगभग 20 से 25 दिनों तक पौधों की देखभाल करनी चाहिए। जब पौधे मजबूत हो जाएं, तब उन्हें मुख्य खेत में रोपाई करनी चाहिए। इस तरीके से पौधों के जीवित रहने की दर बढ़ती है और खेत में एक समान वृद्धि देखने को मिलती है।
रोपाई के दौरान पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। इससे पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व मिलते हैं। सही दूरी न रखने पर उत्पादन पर असर पड़ सकता है। इसलिए शुरुआत से ही वैज्ञानिक पद्धति अपनाना लाभदायक होता है।
सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन पर ध्यान
गेंदा की अच्छी पैदावार के लिए समय-समय पर सिंचाई जरूरी है। खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। साथ ही निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए ताकि खरपतवार फसल को प्रभावित न करें। संतुलित मात्रा में उर्वरक का प्रयोग भी उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसान नियमित निगरानी रखें और रोग-कीट प्रबंधन पर ध्यान दें, तो फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है। अच्छी गुणवत्ता के फूल बाजार में अधिक कीमत दिलाते हैं, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है।
कम लागत में अधिक मुनाफे की संभावना
गेंदा की खेती की खास बात यह है कि इसमें लागत अपेक्षाकृत कम आती है, जबकि मांग पूरे वर्ष बनी रहती है। शादी-विवाह के मौसम में इसकी कीमत और बढ़ जाती है। यदि किसान फरवरी में वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती शुरू करते हैं, तो कम समय में अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
समस्तीपुर और आसपास के क्षेत्रों में कई किसान अब इसे आय के स्थायी स्रोत के रूप में अपना रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सही मार्गदर्शन और तकनीकी जानकारी के साथ गेंदा की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

