KidneyBeansFarming – अररिया में राजमा की खेती से किसानों को बढ़ता लाभ
KidneyBeansFarming – बिहार के अररिया जिले में इन दिनों खेती का रुख बदलता दिखाई दे रहा है। पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अब किसान नई संभावनाओं की तलाश में जुटे हैं। इन्हीं विकल्पों में राजमा की खेती तेजी से उभर रही है। पोषक तत्वों से भरपूर यह दलहनी फसल बाजार में लगातार मांग बनाए हुए है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और बेहतर कीमत मिलने के कारण किसान इसे लाभकारी विकल्प मान रहे हैं। रबी सीजन में मैदानी क्षेत्रों में भी अब राजमा की बुवाई होने लगी है, जिससे खेती का दायरा बढ़ा है और आय के नए रास्ते खुले हैं।

अररिया में नई फसल की ओर झुकाव
जिले के रानीगंज प्रखंड के कचहरी बलुआ गांव के किसान महादेव ने पारंपरिक खेती से अलग रास्ता चुना है। उन्होंने दो एकड़ भूमि पर राजमा की खेती शुरू की और इसे एक सफल प्रयोग के रूप में देखा। उनका कहना है कि शुरुआत में उन्हें भी संकोच था, लेकिन बाजार की मांग और लागत के आकलन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया। अब वे इसे अपनी नियमित फसल का हिस्सा बना चुके हैं। आसपास के किसान भी उनकी सफलता को देखकर प्रेरित हो रहे हैं।
बीज और लागत का संतुलन
महादेव बताते हैं कि वे राजमा के बीज स्थानीय बाजार से ही खरीदते हैं। उनके अनुसार, इस फसल में प्रति एकड़ लगभग 15 हजार रुपये तक की लागत आती है, जिसमें बीज, जुताई, खाद और सिंचाई का खर्च शामिल है। पारंपरिक फसलों की तुलना में यह लागत नियंत्रित रहती है। उनका अनुभव है कि यदि समय पर बुवाई और देखभाल की जाए तो उत्पादन बेहतर मिलता है। करीब 90 दिनों में फसल तैयार हो जाती है, जिससे खेत ज्यादा समय तक खाली नहीं रहता और किसान अगली फसल की तैयारी भी कर सकता है।
तीन महीने में उल्लेखनीय आमदनी
महादेव का दावा है कि दो एकड़ में की गई खेती से उन्हें लगभग दो लाख रुपये तक की आमदनी हुई। यह आंकड़ा बाजार की कीमत और उत्पादन पर निर्भर करता है, लेकिन उनका कहना है कि राजमा ने अपेक्षा से बेहतर परिणाम दिए। कम समय में तैयार होने वाली इस फसल से नकदी प्रवाह तेज रहता है। यही वजह है कि कई किसान इसे आर्थिक रूप से लाभकारी मानने लगे हैं। यदि क्षेत्रफल बढ़ाया जाए तो आय में भी उसी अनुपात में वृद्धि संभव है।
कम पानी में भी बेहतर उत्पादन
राजमा की खेती का एक बड़ा फायदा यह है कि इसे अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। महादेव बताते हैं कि सामान्य परिस्थितियों में दो से तीन बार पानी देना पर्याप्त होता है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी यह फसल ठीक रहती है, जिससे जोखिम कम हो जाता है। जलवायु अनुकूल होने पर पौधों की वृद्धि अच्छी होती है और दानों की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है। यही कारण है कि बदलते मौसम के बीच यह फसल किसानों को स्थिरता देती है।
अन्य गतिविधियों से बढ़ती कुल आय
महादेव केवल राजमा पर निर्भर नहीं हैं। वे पशुपालन और सब्जी उत्पादन भी करते हैं। उनका कहना है कि अलग-अलग स्रोतों से आय होने पर जोखिम बंट जाता है और सालाना कमाई बेहतर हो जाती है। सीजन के दौरान वे पांच से छह लाख रुपये तक अर्जित कर लेते हैं। उनका अनुभव है कि फसल विविधीकरण से खेती अधिक टिकाऊ बनती है। राजमा ने इस मॉडल को मजबूत किया है और उन्हें बाजार में नई पहचान दिलाई है।
विशेषज्ञों की राय में संभावनाएं
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान उन्नत किस्मों का चयन करें और समय पर कीट नियंत्रण तथा पोषण प्रबंधन करें तो उत्पादन में और वृद्धि संभव है। दलहनी फसलों की मांग लगातार बनी रहती है, इसलिए उचित विपणन रणनीति भी जरूरी है। अररिया जैसे क्षेत्रों में जहां मिट्टी और जलवायु अनुकूल है, वहां राजमा एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
अररिया के किसानों की यह पहल बताती है कि बदलते दौर में खेती के तौर-तरीकों में बदलाव जरूरी है। सही योजना और बाजार की समझ के साथ नई फसलें अपनाकर आय बढ़ाई जा सकती है। राजमा की खेती ने जिले में यही संदेश दिया है कि परंपरा के साथ नवाचार भी जरूरी है।

