AGRICULTURE

Guava Farming: छोटे खेत से बड़ी कमाई की कहानी प्राकृतिक खेती ने बदली किसान की किस्मत

Guava Farming: सौराष्ट्र और गुजरात के कई इलाकों में खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब किसान केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि ऐसी खेती को अपना रहे हैं जो कम लागत में अधिक लाभ दे सके। प्राकृतिक खेती इसी बदलाव का मजबूत आधार बनकर सामने आई है। यह खेती न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी साबित हो रही है। इसी दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण भावनगर जिले के एक छोटे किसान की कहानी है, जिन्होंने मात्र 60 अमरूद के पौधों से अच्छी आमदनी का रास्ता बना लिया।

Guava farming

प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता रुझान

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में अब बड़ी संख्या में किसान प्राकृतिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। पहले जहां रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का अधिक उपयोग होता था, वहीं अब किसान देसी तरीकों को अपना रहे हैं। प्राकृतिक खेती में गोबर, जीवामृत, घन जीवामृत, पत्तियों से बने अर्क जैसे संसाधनों का उपयोग किया जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। किसान महसूस कर रहे हैं कि लंबे समय में यह तरीका ज्यादा टिकाऊ और भरोसेमंद है।

बागवानी फसलों से बढ़ी संभावनाएं

प्राकृतिक खेती के साथ बागवानी फसलों का संयोजन किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। अमरूद, आम, सीताफल, नारियल जैसी फसलें कम देखभाल में भी अच्छा उत्पादन देती हैं। इन फसलों को दूसरी फसलों के साथ उगाया जा सकता है, जिससे खेत का बेहतर उपयोग होता है। बागवानी फसलों की बाजार में मांग भी स्थिर रहती है, जिससे किसानों को सही दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती तक का सफर

भावनगर जिले के जमवाली-1 गांव के किसान भरतभाई पहले पारंपरिक रासायनिक खेती किया करते थे। वे कपास और मूंगफली जैसी फसलें उगाते थे, लेकिन बाजार में सही कीमत न मिलने से उनकी आमदनी सीमित रह जाती थी। लागत अधिक और मुनाफा कम होने के कारण वे लंबे समय से परेशान थे। वर्ष 2018 में उन्होंने प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी हासिल की और इसे अपनाने का निर्णय लिया।

अमरूद की खेती से बदली तस्वीर

भरतभाई ने जोखिम उठाते हुए अपने खेत में 60 अमरूद के पौधे लगाए। उन्होंने किसी भी तरह के रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया। प्राकृतिक तरीके से तैयार किए गए पत्तियों के अर्क का हल्का छिड़काव ही उनकी फसल के लिए पर्याप्त रहा। तीन वर्षों के भीतर इन पौधों से 60 हजार से अधिक अमरूद का उत्पादन हुआ। यह संख्या एक छोटे खेत के हिसाब से बेहद प्रभावशाली मानी जाती है।

कम लागत में बेहतर आमदनी

प्राकृतिक खेती की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है। भरतभाई को न तो महंगे उर्वरकों पर खर्च करना पड़ा और न ही दवाओं पर। खेत में उपलब्ध संसाधनों से ही खेती संभव हो सकी। अमरूद की अच्छी गुणवत्ता के कारण उन्हें बाजार में बेहतर दाम मिला। कुल उत्पादन से लगभग एक लाख रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है, जो पहले की खेती की तुलना में कहीं अधिक है।

सीधे बिक्री से बढ़ा मुनाफा

भरतभाई ने अपनी उपज को सीधे गांव और आसपास के लोगों को बेचना शुरू किया। इससे उन्हें बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा। ताजा और रसायन मुक्त अमरूद की मांग तेजी से बढ़ी, जिससे उन्हें बाजार भाव से अधिक कीमत मिली। सीधे बिक्री के इस मॉडल ने उनकी आय में और भी इजाफा किया।

गांव के लिए प्रेरणा बने किसान

गांव में भरतभाई पहले किसान थे जिन्होंने अमरूद की प्राकृतिक खेती शुरू की। उनकी सफलता देखकर अन्य किसान भी प्रेरित हुए और अब प्राकृतिक खेती को अपनाने पर विचार कर रहे हैं। भरतभाई का मानना है कि किसान बैठकों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अनुभव साझा करने से उन्हें सही दिशा मिली। आज वे न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी मार्गदर्शक बन चुके हैं।

प्राकृतिक खेती के दीर्घकालिक फायदे

प्राकृतिक खेती केवल वर्तमान लाभ तक सीमित नहीं है। इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है, जल संरक्षण होता है और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव कम पड़ता है। रसायन मुक्त फसलें उपभोक्ताओं के लिए भी सुरक्षित होती हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक खेती को भविष्य की टिकाऊ कृषि प्रणाली माना जा रहा है।

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